मुल्क कंगाल, लेकिन ख्वाब ‘नोबेल’ वाले! पाकिस्तान की इस मांग पर हंस रही है पूरी दुनिया
global diplomacy news 2026: बेकाबू महंगाई, कर्ज का बोझ, पेट्रोल-डीजल एवं रसोई गैस की लड़खड़ाई आपूर्ति और भयावह बिजली संकट को भूल पाकिस्तान के कुछ नागरिक आजकल जश्न मनाने में मशगूल हैं। समाचार पत्रों, न्यूज चैनलों तथा सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल जनरल असीम मुनीर की प्रशंसा में कसीदे पढ़े जा रहे हैं।
शहबाज और मुनीर को चाहिए नोबेल प्राइज
जरूरत से ज्यादा उत्साहित कुछ संगठनों ने शहबाज शरीफ और असीम मुनीर को नोबेल शांति पुरस्कार देने की मांग कर डाली है। इसके बाद सोशल मीडिया पर नई जंग शुरू हो गई है। एक तरफ पाकिस्तानी पीएम और सेना प्रमुख के समर्थक हैं, दूसरी ओर विरोधी। इस बीच ब्रिटेन के एक पत्रकार ने पाकिस्तान के मजे लेने में देर नहीं की। उन्होंने सोशल प्लेटफार्म पर लिखा, पाकिस्तान को भारत में मिला लो। जिस मुल्क में ओसामा बिन लादेन जैसे कुख्यात आतंकवादी को पनाह मिली, उस देश पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता है।
दरअसल पाकिस्तान को नोबेल पुरस्कार देने की हास्यास्पद मांग के पीछे अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध विराम का मामला है। युद्ध विराम में कथित तौर पर पाकिस्तान ने बिचौलिए की भूमिका निभाई थी। हालांकि जानकारों का मानना है कि इस मामले में इस्लामाबाद का रोल सिर्फ पत्रवाहक या डाकिए जैसा रहा। वह अमेरिका और ईरान के प्रस्ताव व संदेश को एक-दूसरे तक पहुंचाता रहा।
अब दस अप्रैल को इस्लामाबाद में दोनों पक्षों के बीच अहम वार्ता होनी है। पाकिस्तानियों का मानना है कि चूंकि एक विनाशकारी जंग को अस्थाई तौर पर बंद कराने में उनके देश ने महत्वपूर्ण किरदार निभाया है, इसलिए शहबाज शरीफ और असीम मुनीर नोबेल पुरस्कार पाने के हकदार हैं। इस्लामाबाद बेशक युद्धविराम का श्रेय खुद बटोरने में लगा है, मगर पर्दे के पीछे चीन की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। खबर है कि बीजिंग ने अंतिम मौके पर ईरान के शीर्ष नेतृत्व को राजी किया था। वैसे देखा जाए तो पाकिस्तान और ईरान के रिश्ते कभी भी सहज नहीं रहे।
परमाणु ताकत का घमंड और शिया-सुन्नी का झगड़ा
दोनों में एक तरफ धार्मिक मतभेद हैं जहां सुन्नी और शिया का सवाल हमेशा तनाव का कारण बना रहा, दूसरी ओर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी है। पाकिस्तान खुद को इस्लामी दुनिया की एकमात्र परमाणु ताकत के रूप में देखता रहा है। वह नहीं चाहता कि कोई और मुस्लिम देश इस श्रेणी में आए। ऐसे में ईरान का परमाणु कार्यक्रम पाकिस्तान के लिए असहजता का कारण बनता है।
नतीजन पाकिस्तान खुले मंच पर बेशक तटस्थता की बात करे, मगर पर्दे के पीछे वह अलग खेल खेलता दिखता है। यह दोहरापन सिर्फ ईरान के मामले तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान एक ओर अमेरिका के साथ खुफिया सूचना साझा करता है, वहीं खुद को शांति दूत के रूप में प्रस्तुत करता है। ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध में पाकिस्तान ने शांति वार्ता कराने की पहल का दिखावा किया, मगर सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में शांति की कोशिश थी या अपनी छवि सुधारने का प्रयास था? अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध भी इस संदर्भ में दिलचस्प हैं।
अगर हवा में दो परमाणु मिसाइलें भिड़ जाएं तो क्या होगा, जानें
डोनाल्ड ट्रंप बेयाक अपने पिछले कार्यकाल में पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर कठघरे में खड़ा कर चुके हों, मगर वर्तमान परिस्थितियों में उनका रुख बदला नजर आता है। इसकी एक वजह यह भी है कि ट्रंप परिवार का पाकिस्तान में आर्थिक निवेश है। ऐसे में रणनीतिक हित और निजी हित एक-दूसरे में घुलते नजर आते हैं। कुछ नागरिकों का मानना है कि पूर्व में जैसे डोनाल्ड ट्रंप को नोबेल पुरस्कार मिला था, वैसे ही शहबाज शरीफ और असीम मुनीर को भी सपनों में यह पुरस्कार मिल सकता है।

