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सपा और AIMIM कर सकते हैं गठबंधन, ओवैसी के नए ऐलान से बिगड़ सकता है यूपी का समीकरण

UP Politics 2026: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा इलेक्शनों के लिए सियासी माहौल में तेज़ी से बदलाव हो रहा है। समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच मुकाबला पहले ही कड़ा माना जा रहा है, मगर अब इस राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में एक नया मोड़ आया है। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने भी यूपी में अपनी पूरी ताकत झोंकने का ऐलान किया है और इसके बाद सियासी पारा और चढ़ गया है। ओवैसी के समर्थन से कई विश्लेषकों का मानना है कि इस बार चुनावी मुकाबला और दिलचस्प होगा।

ओवैसी की योजनाओं से बढ़ी सियासी दहशत

ओवैसी ने हाल ही में पार्टी के स्थापना दिवस समारोह के दौरान यूपी में पूरे दमखम से चुनाव लड़ने की योजना का खुलासा किया। उन्होंने यह भी कहा कि उनके समर्थक यूपी में उनकी पार्टी की उपस्थिति पर सवाल उठा रहे हैं। ये बयान इस ओर इशारा करता है कि ओवैसी अब यूपी में अपनी राजनीतिक जड़ें मजबूत करना चाहते हैं। इसके साथ ही ये सवाल भी खड़ा हो रहा है कि ओवैसी की बढ़ती सक्रियता से राज्य की राजनीति में कौन सी पार्टी परेशान होगी?

सपा और ओवैसी की पार्टियों के बीच हो सकता है गठबंधन

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ओवैसी के इस ऐलान के बाद उनकी आलोचना की और ये कहा कि ओवैसी साइकिल पर सवार होकर चुनाव में उतरेंगे। यह टिप्पणी इस बात का संकेत देती है कि सपा और ओवैसी की पार्टियों के बीच गठबंधन हो सकता है, जो 2027 में यूपी के राजनीतिक दलों के लिए एक नई चुनौती पेश करेगा। खासकर मुस्लिम समुदाय को लेकर यूपी में हो रहे सियासी हलचलों को देखते हुए यह गठबंधन अहम साबित हो सकता है।

मुस्लिम मतदाताओं का महत्वपूर्ण प्रभाव

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव भी इस बार की राजनीति को प्रभावित करेगा। राज्य के 14 जिलों में मुस्लिम आबादी 25 प्रतिशत से ज्यादा है और कुल मुस्लिम मतदाताओं का संख्या 20 प्रतिशत के करीब है। इस वजह से 147 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक भूमिका हो सकती है। इनमें से 70 सीटों पर मुस्लिम आबादी 20 से 30 प्रतिशत के बीच है, वहीं 73 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है। इन आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार इन सीटों पर बीजेपी और सपा के लिए नई चुनौती पैदा कर सकते हैं।

ओवैसी के लिए क्या है भविष्य?

हालांकि, पिछली दो चुनावों में ओवैसी की पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। 2017 और 2022 में उनकी पार्टी को बहुत कम वोट मिले थे। 2022 में तो उन्होंने 95 सीटों पर चुनाव लड़ा था, मगर उन्हें महज 0.49 प्रतिशत वोट ही मिले। इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी की सियासी मजबूती बीजेपी के लिए खतरा बन सकती है, खासकर अगर वो मुस्लिम बहुल सीटों पर हिंदू उम्मीदवार उतारते हैं। इससे बीजेपी को नुकसान हो सकता है।

क्या थर्ड फ्रंट बनेगा?

एआईएमआईएम के यूपी प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने यूपी में थर्ड फ्रंट बनाने का प्रस्ताव रखा है। उनका मानना है कि बीएसपी और एआईएमआईएम के बीच गठबंधन यूपी की राजनीति में बड़ा असर डाल सकता है। सपा भी ओवैसी के साथ गठबंधन की संभावनाओं को लेकर इशारों-इशारों में बयान दे रही है। वहीं कांग्रेस ने ओवैसी को सावधान रहने की सलाह दी है, क्योंकि उनकी पार्टी का प्रभाव उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए परेशानी का कारण बन सकता है।

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क्या होगा 2027 में?

2027 के विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण किस दिशा में जाएंगे, ये समय ही बताएगा। हालांकि, ये जरूर साफ है कि यूपी की सियासत में ओवैसी का बढ़ता प्रभाव बीजेपी और सपा के लिए एक नई चुनौती पैदा कर सकता है। चुनावी रणनीतियों में बदलाव, मुस्लिम मतदाताओं की निर्णायक भूमिका और सपा-बीजेपी के बीच की कड़ी टक्कर इस बार के चुनाव को खास बनाएगी।

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