donald trump की मेहनत पर फिरा पानी, टैरिफ की वजह से अमेरिका को हो सकता है भारी नुकसान
अमेरिका में राष्ट्रपति donald trump की व्यापार नीतियों को लेकर एक बार फिर न्यायिक रोकटोक सामने आई है। हाल ही में संघीय अपील अदालत ने ट्रंप द्वारा व्यापारिक साझेदारों पर लगाए गए भारी टैरिफ को अवैध करार दिया है। अदालत का ये फैसला न केवल राष्ट्रपति के एक बड़े दांव पर पानी फेरने जैसा है बल्कि इसके पीछे छुपा है आम जनता पर पड़ने वाला असर जो अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। (donald trump news)
ट्रंप टैरिफ से उपभोक्ता व उद्योग दोनों प्रभावित
टैरिफ लगने का सीधा मतलब होता है सामान की कीमतों में इजाफा जो उपभोक्ताओं की जेब पर बुरा असर डालता है। जून से जुलाई तक ट्रंप प्रशासन ने टैरिफ के रूप में 159 अरब डॉलर का राजस्व जुटाया, मगर अब अदालत के आदेश के बाद इन पैसों को लौटाने का खतरा मंडरा रहा है। इससे वित्तीय घाटा बढ़ने के साथ-साथ आम लोगों के लिए महंगाई की मार और ज्यादा कड़ी हो सकती है। व्यवसायों को अपने खर्च बढ़ाने पड़ेंगे, जिसका बोझ उपभोक्ताओं को उठाना पड़ सकता है। (trump news)
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सुप्रीम कोर्ट तक का रास्ता और विवाद
अदालत ने अब इस मामले को सुप्रीम कोर्ट के सामने भेजने के लिए ट्रंप प्रशासन को मौका दिया है। फिलहाल टैरिफ लागू हैं, परंतु इससे जुड़ी अस्थिरता बनी हुई है। इस फैसले ने व्यापार नीतियों की स्थिरता पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट भी इस फैसले को बरकरार रखता है, तो मुद्रा बाजार, निवेश और व्यापारिक समझौतों पर इसका गहरा असर पड़ेगा।
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टैरिफ हटने पर अमेरिका को नुकसान
संयुक्त राज्य के न्याय विभाग ने चेतावनी दी है कि यदि ये टैरिफ (US tariffs) हटाए गए तो करोड़ों डॉलर की वापसी करनी पड़ेगी, जो अमेरिका के आर्थिक तंत्र के लिए भारी चोट साबित हो सकता है। लिहाजा, लाखों लोगों की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं और घरेलू उत्पादकों को भी नुकसान उठाना होगा। सामाजिक सुरक्षा और मेडिकेयर जैसी योजनाओं पर भी संकट छा सकता है, जो सीधे आम जनता की भलाई को प्रभावित करता है।
donald trump की टैरिफ की रणनीति में ये हथियार बड़े पैमाने पर देशों को प्रभावी बनने और अमेरिकन हितों की रक्षा करने के लिए एक दबाव का जरिया था। मगर इसके अब कमजोर पड़ने से उसे वैश्विक मंच पर सौदा तय करने में मुश्किल आ सकती है। इससे अमेरिकी विदेश नीति की बातचीत में भी कमजोरी आ सकती है, जहां विदेशी सरकारें अपनी शर्तें बदल सकती हैं।


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