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अब अखिलेश की तरकीब आजमा रहे तेजस्वी, बिहार में अपनाई ये जीत वाली रणनीति

RJD election strategy 2025: बिहार में इस बार की चुनावी रणनीति समाजवादी नेता अखिलेश यादव द्वारा अपनाई गई नई योजना पर आधारित है, जो राज्य की राजनीति में एक अहम बदलाव ला सकती है। तेजस्वी यादव की महागठबंधन सरकार में चीफ मिनिस्टर बनने की संभावनाएं मजबूत हो रही हैं, खासकर उनकी रणनीति के तहत अलग अलग जातीय और सामाजिक वर्गों को एकजुट करने की कोशिशों से। उनका मकसद केवल यादव-मुस्लिम समीकरण तक सीमित नहीं है बल्कि उन्होंने मल्लाह, कुशवाहा और अत्यंत पिछड़े वर्गों को भी अपने पक्ष में करने का लक्ष्य तय किया है।

एनडीए के वोट बैंक को तोड़ना है असली मकसद

तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन ने बिहार की राजनीति को एक नई दिशा देने के लिए अपने गठबंधन के सामाजिक समीकरण को मजबूत किया है। इस बार मल्लाह और कुशवाहा जातियों को डिप्टी सीएम मुकेश सहनी जैसे नेताओं के माध्यम से आकर्षित करने का प्रयास किया गया है। यह एक सोची-समझी चाल है, जिसका मकसद एनडीए के पारंपरिक वोट बैंक को तोड़ना है। इसके अलावा, यादव और मुस्लिम वर्ग को भी महागठबंधन में शामिल कर उनकी राजनीतिक ताकत को और बढ़ाया गया है।

कुशवाहा समाज को लेकर बड़ी रणनीति (RJD election strategy 2025)

कुशवाहा जाति जो बिहार के ओबीसी वर्ग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है, उसने वर्षों तक नीतीश कुमार के साथ मिलकर राज्य की सियासत को आकार दिया था। मगर अब यह जाति धीरे-धीरे आरजेडी के प्रति रुझान दिखा रही है। तेजस्वी यादव ने इस बदलाव को भांपते हुए कुशवाहा समाज को अपनी रणनीति में प्रमुख स्थान दिया। टिकट वितरण में कुशवाहा समाज को ज्यादा प्राथमिकता दी गई है, जिससे नीतीश कुमार को राजनीतिक नुकसान हो सकता है।

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इंडिया महागठबंधन ने चुनावी मैदान में उम्मीदवारों का चयन करते समय समाज के अलग अलग तबकों को उचित प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया है। आरजेडी ने यादव और मुस्लिमों के अलावा कुशवाहा, निषाद और अन्य पिछड़े वर्गों से उम्मीदवार खड़े किए हैं। कांग्रेस ने अति पिछड़ी जातियों को टिकट दिया है, वहीं माले और वामपंथी दलों ने भी इन्हीं वर्गों को प्राथमिकता दी है। इस तरीके से महागठबंधन का चुनावी खेल समाज के हर वर्ग को शामिल करने पर आधारित है।

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एनडीए की बढ़ती मुश्किलें

2020 के विधानसभा इलेक्शनों में महागठबंधन को महज चार फीसदी वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। अब तेजस्वी यादव इस कमी को पूरा करने के लिए पूरी ताकत से जुटे हैं। उन्होंने यादव-मुस्लिम समीकरण को फिर से मजबूत करने के साथ-साथ मल्लाह और कुशवाहा समाज को एनडीए से अलग करने की कोशिशें शुरू की हैं। अगर यह दांव सफल रहा तो एनडीए के वोट बैंक में 5 से 10 प्रतिशत की सेंध लग सकती है। इससे बिहार की राजनीति में एक नया बदलाव आ सकता है।

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तेजस्वी का सोशल इंजीनियरिंग मॉडल

दिग्गज नेता तेजस्वी यादव की यह नई राजनीतिक रणनीति एक तरह से अखिलेश यादव के यूपी मॉडल का विस्तार है। जहां अखिलेश यादव ने यादव-मुस्लिम ओबीसी समीकरण का लाभ उठाकर सत्ता में वापसी की थी, वहीं तेजस्वी यादव ने यादव, मल्लाह, कुशवाहा और अन्य पिछड़े वर्गों को एकजुट करने की योजना बनाई है। यदि यह रणनीति सफल होती है तो तेजस्वी यादव के लिए बिहार की सत्ता में वापसी लगभग तय हो सकती है।

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क्या ये प्रयोग सफल होगा

अब ये देखना दिलचस्प होगा कि तेजस्वी यादव की ये सोची-समझी रणनीति जनता के बीच कितनी लोकप्रिय होती है। अगर ये प्रयोग वोट बैंक में तब्दील हो जाता है तो महागठबंधन की जीत की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। मगर सियासी पंडितों का मानना है कि ये सोशल इंजीनियरिंग प्रयोग बिहार के चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा प्रयोग साबित हो सकता है बशर्ते इसे सही तरीके से लागू किया जाए।

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