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सपा का ब्राह्मण कार्ड, भाजपा को 2027 विधानसभा चुनाव से पहले लग सकता है बड़ा झटका

EELA INDIA EXCLUSIVE REPORT

Lucknow. उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, राज्य की सियासत में ‘जातीय समीकरणों’ की बिसात बिछने लगी है। समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा ब्राह्मणों को साधने की कोशिशों और भाजपा के भीतर ब्राह्मण विधायकों की हालिया हलचल ने इस चर्चा को हवा दे दी है। ऐसे में यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि क्या वाकई 2027 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के ब्राह्मण कार्ड से भाजपा को बड़ा झटका लग सकता है?

तो आइए समझते हैं इस पूरे राजनीतिक खींचतान और घटनाक्रम को…

सपा का ‘PDA’ प्लस ब्राह्मण फॉर्मूला

अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनाव 2024 में PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जरिए बड़ी सफलता हासिल की थी। अब 2027 के लिए सपा की रणनीति इसमें ब्राह्मणों को जोड़ने की है:

मिशन 40 प्रतिशत

सपा का लक्ष्य अपने मूल वोट बैंक के साथ-साथ ब्राह्मणों के कम से कम 20-30 प्रतिशत वोट हासिल करना है। जानकारों का मानना है कि यदि ब्राह्मणों का एक छोटा हिस्सा भी सपा की तरफ झुकता है, तो भाजपा के लिए बहुमत का आंकड़ा पाना मुश्किल हो सकता है।

सम्मान का कार्ड

शिवपाल यादव ने हाल ही में भाजपा के नाराज ब्राह्मण नेताओं के साथ बैठक की है और उन्हें सपा में आने का खुला न्योता दिया है। साथ ही शिवपाल ने दावा करते हुए कि यहां उन्हें “उचित सम्मान” मिलेगा।

भाजपा के भीतर ब्राह्मण विधायकों की ‘बाटी-चोखा’ बैठक

दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में लखनऊ में भाजपा के करीब 40-46 ब्राह्मण विधायकों की एक अनौपचारिक बैठक (सहभोज) हुई। हालांकि इसे व्यक्तिगत मिलन बताया गया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसके गहरे सियासी मायने निकाले जा रहे हैं और इसे सरकार के भीतर एक ‘दबाव समूह(प्रेशर ग्रुप)’ बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

नाराजगी के संकेत: चर्चा है कि ब्राह्मण समाज के कुछ प्रतिनिधि नौकरशाही में अपनी सुनवाई न होने और कुछ प्रशासनिक निर्णयों से असंतुष्ट हैं।

भाजपा की जवाबी रणनीति

भाजपा इस खतरे को भांपते हुए “डैमेज कंट्रोल” में जुट गई है।

कोर वोट बैंक

भाजपा के नेता दावा कर रहे हैं कि ब्राह्मण मतदाता शत प्रतिशत ‘कमल’ के साथ हैं और सपा के झांसे में नहीं आएंगे।

संगठनात्मक बदलाव

2027 से पहले भाजपा अपने प्रदेश संगठन में बड़े बदलाव कर सकती है ताकि सभी जातियों का संतुलन साधा जा सके।

इन सब के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह भाजपा के लिए झटका होगा?

क्या कहते हैं आंकड़े

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की संख्या लगभग 10-12% है, लेकिन उनकी राजनीतिक पकड़ और माहौल बनाने की क्षमता कहीं अधिक है। इतिहास गवाह है कि जब भी यह वर्ग किसी पार्टी से छिटका है (जैसे 2007 में बसपा या 2012 में सपा की ओर), सत्ता परिवर्तन हुआ है।

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सपा का ब्राह्मण कार्ड तभी सफल होगा जब वह यह साबित कर पाए कि भाजपा शासन में ब्राह्मण उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। फिलहाल, भाजपा के भीतर की यह ‘अंदरूनी हलचल’ सपा के लिए एक बड़ा अवसर बनती दिख रही है।

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