चढ़ाकर सीढ़ी हटा लेते हैं लोग, अखिलेश ने पंकज चौधरी के बहाने BJP की दुखती रग पर रखा हाथ
Akhilesh on Pankaj Chaudhary: उत्तर प्रदेश की सियासत इन दिनों बयानों के तीखे बाणों और सोशल मीडिया पोस्ट के इर्द-गिर्द सिमट गई है। ताजा मामला समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के उस पोस्ट का है जिसने भाजपा के भीतर मचे घमासान को एक नई हवा दे दी है। अखिलेश यादव ने भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के बहाने सत्ताधारी दल की कार्यप्रणाली और उनके अंतर्विरोधों पर करारा प्रहार किया है। यह हमला केवल एक राजनैतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि यूपी की पिछड़ा और दलित (PDA) राजनीति को साधने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है।
पंकज चौधरी के बहाने पीडीए कार्ड का दांव
बीजेपी ने महाराजगंज से सात बार के सांसद पंकज चौधरी को प्रदेश की कमान सौंपकर कुर्मी समाज और पूर्वांचल को साधने की कोशिश की है। हालांकि अखिलेश यादव ने इसी नियुक्ति को भाजपा की ‘भेदकारी सोच’ का प्रतीक बता दिया।
उनका तर्क है कि सात बार के सांसद के अनुभव को दरकिनार कर पांच बार के विधायक नितिन नवीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बना देना सीधे तौर पर वरिष्ठता का अपमान है। अखिलेश ने इसे पिछड़ा वर्ग बनाम सवर्ण समाज की लड़ाई के तौर पर पेश किया है। उनका कहना है कि भाजपा ने पद तो दिया लेकिन कद और सम्मान देने में कंजूसी कर दी।
दिल्ली बनाम लखनऊ: वर्चस्व की खींचतान
सपा प्रमुख ने अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ‘डबल इंजन टकराहट 2.0’ का जिक्र करते हुए दिल्ली और लखनऊ के बीच की दूरी को उजागर किया। उन्होंने इशारों में कहा कि भाजपा के भीतर अब दो अलग-अलग केंद्र बन चुके हैं जो एक-दूसरे की जड़ें काटने में लगे हैं। अखिलेश ने पंकज चौधरी के प्रति सहानुभूति जताते हुए उन्हें आगाह किया कि भाजपा में उन लोगों का भविष्य सुरक्षित नहीं है जिनका इस्तेमाल केवल सत्ता तक पहुंचने के लिए किया जाता है। उन्होंने तंज कसते हुए लिखा कि भाजपा वह पार्टी है जो छत पर चढ़ाकर सीढ़ी हटा लेती है और कुएं में उतारकर रस्सी खींच लेती है।
वणिक समाज और बेरोजगारी पर तीखा प्रहार
अखिलेश यादव का हमला सिर्फ जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने उस वणिक समाज (व्यापारी वर्ग) का भी जिक्र किया जिसे भाजपा का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है। अखिलेश के मुताबिक जीएसटी की मार और मंदी के कारण यह समाज आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के पास युवाओं के लिए नौकरियों का कोई एजेंडा नहीं है। यही वजह है कि व्यापारियों के बच्चे अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित हैं। उन्होंने भाजपा को ‘खुदगर्जों का खानदान’ करार देते हुए कहा कि वहां अपनों को ही अपमान झेलना पड़ता है।
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क्या ओबीसी राजनीति का रुख बदल पाएगा?
मौजूदा दौर में उत्तर प्रदेश की पूरी राजनीति ओबीसी वोटों के इर्द-गिर्द घूम रही है। भाजपा को उम्मीद है कि पंकज चौधरी को अध्यक्ष बनाकर वह पिछड़ों के बीच अपनी पैठ और मजबूत कर पाएगी। वहीं अखिलेश यादव अपने ‘पीडीए’ फॉर्मूले के जरिए यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा में पिछड़ों को केवल ‘टूल’ (औजार) की तरह इस्तेमाल किया जाता है और असली ताकत कुछ खास लोगों के पास ही रहती है। अब देखना यह होगा कि अखिलेश की यह ‘सहानुभूति’ जनता के बीच क्या असर दिखाती है।

