मायावती ने फिर निकाला जीत का पुराना फॉर्मूला, विपक्षियों की बढ़ी टेंशन
यूपी की राजनीति में भले ही विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं मगर राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी चालें चलना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में बहुजन समाज पार्टी ने एक अलग रास्ता अपनाते हुए समय से पहले ही कई विधानसभा सीटों पर प्रभारियों की नियुक्ति शुरू कर दी है। इस कदम को केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
बसपा सुप्रीमो Mayawati की यह रणनीति संकेत देती है कि पार्टी आने वाले चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रही है। लंबे समय से कमजोर होती चुनावी स्थिति के बीच बसपा अब अपने पुराने सामाजिक समीकरण को फिर से मजबूत करने की कोशिश में दिखाई दे रही है।
समय से पहले उम्मीदवारों की तैयारी
बीएसपी की परंपरा रही है कि जिस नेता को किसी विधानसभा क्षेत्र का प्रभारी बनाया जाता है वही आगे चलकर पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार बनता है। इसी परंपरा के तहत हाल ही में कई जिलों में प्रभारियों की नियुक्ति की गई है।
Azamgarh, Jaunpur, Saharanpur और Jalaun जैसी सीटों पर नियुक्तियां इसी योजना का हिस्सा मानी जा रही हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दो से तीन महीनों के भीतर पार्टी लगभग 100 सीटों पर संभावित उम्मीदवारों को लेकर स्थिति स्पष्ट कर सकती है।
पार्टी के भीतर हर विधानसभा सीट के लिए चार दावेदारों का एक पैनल तैयार किया जा रहा है। इसके बाद उनकी समीक्षा की जाती है और फिर एक नाम को प्रभारी बनाकर आगे उम्मीदवार घोषित किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी मंडल और जोन स्तर के वरिष्ठ नेता कर रहे हैं।
फिर से चर्चा में 2007 वाला सोशल समीकरण
बसपा की मौजूदा राजनीतिक तैयारी ने 2007 के विधानसभा चुनावों की याद दिला दी है। उस समय Mayawati ने दलित ब्राह्मण और मुस्लिम समुदायों को साथ लाकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी एक बार फिर उसी तरह का सामाजिक समीकरण बनाने की दिशा में काम कर रही है। हाल में जिन नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है उनमें मुस्लिम और ब्राह्मण चेहरे भी शामिल हैं। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी किन वर्गों को साधने की कोशिश कर रही है।
दलित आधार के साथ नए सामाजिक संतुलन की कोशिश
बसपा की रणनीति का पहला लक्ष्य अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक को फिर से सक्रिय करना है। इसके साथ ही ब्राह्मण और मुस्लिम मतदाताओं को जोड़ने की योजना बनाई जा रही है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार ब्राह्मण समुदाय को टिकट देकर राजनीतिक संदेश देने की तैयारी है। वहीं मुस्लिम उम्मीदवारों को उतारकर विपक्षी दलों के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति पर भी काम हो रहा है।
इसके अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी को भी महत्व देने की योजना है। कई जिलों में एक से दो ओबीसी उम्मीदवारों को मैदान में उतारने पर विचार किया जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दो से तीन मुस्लिम उम्मीदवार उतारने की संभावना भी जताई जा रही है।
अकेले चुनाव लड़ने का फैसला
बसपा ने यह भी साफ कर दिया है कि 2027 का विधानसभा चुनाव किसी बड़े गठबंधन के सहारे नहीं लड़ा जाएगा। पार्टी अकेले दम पर मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है।
पार्टी का मानना है कि जल्दी उम्मीदवार घोषित करने से संगठन को मजबूत होने का समय मिलेगा। कार्यकर्ताओं को भी अपने क्षेत्र में काम करने का अवसर मिलेगा। आमतौर पर अन्य दल अंतिम समय में टिकट घोषित करते हैं मगर बसपा इससे अलग रास्ता अपनाना चाहती है।
कमजोर पड़ते जनाधार को बचाने की चुनौती
पिछले एक दशक में बसपा की चुनावी स्थिति लगातार कमजोर हुई है। कभी लगभग 30 प्रतिशत वोट शेयर पाने वाली पार्टी को हाल के चुनावों में बड़ा झटका लगा है।
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2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा केवल एक सीट जीत पाई थी। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी कोई सीट हासिल नहीं कर सकी। ऐसे में 2027 का चुनाव बसपा के लिए केवल सत्ता की लड़ाई नहीं बल्कि राजनीतिक अस्तित्व की भी परीक्षा माना जा रहा है।

