International Women’s Day: राष्ट्रीय काव्य गोष्ठी एवं विचार मंथन का सफल आयोजन
EELA INDIA EXCLUSIVE REPORT
New Delhi. अम्बेडकरी महिला मंच ने 8 मार्च 2026 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ( के अवसर पर राष्ट्रीय काव्य गोष्ठी एवं विचार मंथन कार्यक्रम का सफल आयोजन किया। कार्यक्रम का विषय था,”अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और भारतीय महिलाओं की स्तिथि”, जिस पर देशभर से जुड़ी महिलाओं ने अपने विचार रखे।
अम्बेडकरी महिला मंच की ओर से अनुराधा चौधरी ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए कहा कि प्राचीन काल में महिलाओं की स्तिथि अच्छी थी लेकिन उत्तर वैदिक काल के बाद से ये लगातार गिरती चली गई। आधुनिक युग में शिक्षा के कारण महिलाओं की स्तिथि में सुधार हुआ। भारत में पंडिता रमाबाई और सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा में ऐतिहासिक योगदान दिया।
अमेरिका से पहले भारत में महिलाओं की शिक्षा व अधिकारों के लिए शुरू हो चुकी थी लड़ाई – शालिनी आर्या लाल
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं शालिनी आर्या लाल ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर चर्चा करते हुए कहा कि 1908 ईस्वी में जब पहली बार अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में मुट्ठीभर महिलाएँ काम करने के घंटों में कटौती और बेहतर वेतन की संगठित रूप से माँग कर रही थीं उससे छः दशक पहले से भारत में सावित्रीबाई फुले महिलाओं की शिक्षा व अधिकारों के लिए लड़ रही थीं। उन्होंने अमेरिकी इतिहासकार कैथरीन मेयो की पुस्तक ‘मदर इंडिया’ का ज़िक्र करते हुए बताया कि सौ साल पहले 1926 में प्रकाशित इस पुस्तक में भारतीय महिलाओं की जिन परिस्थितियों का ज़िक्र किया गया है उसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है उल्टे महिला प्रगति में हमने यू-टर्न ले लिया है।
सन्तोष इंदोरा ने कहा कि महिलाओं ने तरक्की की है लेकिन उच्च पदों पर बैठी महिलाएँ भी घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। मीरा सरोज ने लड़कियों के साइंस पढ़ने पर ज़ोर दिया।
डॉ. आंबेडकर स्त्रीवाद के अग्रदूत – शोभा अक्षर
कार्यक्रम की विशिष्ट वक्ता शोभा अक्षर ने डॉ. आंबेडकर को स्त्रीवाद का अग्रदूत बताते हुए कहा कि रेप संस्कृति एक वैश्विक बीमारी बन गई है और महिलाओं के लिए पूरा विश्व ही एप्सटीन फ़ाइल है, लेकिन भारत में ये रेप संस्कृति उतनी ही पुरानी है जितनी महाभारत और रामायण। उन्होंने आगे कहा कि हर स्त्री अपने जीवनकाल में कभी न कभी लैंगिक असमानता की शिकार होती है। स्त्रीवाद को लेकर कोई अच्छी बात होती है तो उन्हें दो महिलाओं सावित्रीबाई फुले और फूलन की याद आती है। सुज़ैन ब्राउन मिलर की बुक ‘अगेंस्ट आर विल’ के माध्यम से वे बलात्कार के मनोविज्ञान पर चर्चा करते हुए कहती हैं कि यह होशोहवास में किया जाने वाला अपराध है।
दूसरी विशिष्ट वक्ता के रूप में शिल्पी चौधरी ने आयोजकों को बधाई देते हुए कहा कि इस तरह के कार्यक्रम से महिलाओं की आवाज़ बाहर आने की शुरुआत तो हुई। वे आगे बताती है कि दस साल पहले फेसबुक पर उन्होंने लिखा था कि,’पुरुषों को चाहिए केवल एक छेद’, जिसपर फैज़ाबाद में खासा हंगामा हुआ था लेकिन आज वही बात सच साबित हो रही है। महिलाओं के प्रति तो बलात्कार सबसे बड़ी हिंसा के रूप में सामने आता ही है जो एक सोची समझी साज़िश होती है लेकिन एक एनिमल एक्टिविस्ट होने के नाते उनके सामने पशुओं से बलात्कार के मामले भी आते हैं। जिसमें उन्होंने कइयों को जेल भिजवाया और पिटवाया भी। औरतों की सोच को लेकर समाज में दुराग्रह होता है इसलिए वे पुरुषों से मदद तो लेती हैं लेकिन सलाह या इजाज़त नहीं।
महिलाओं की लड़ाई पुरुषों से नहीं है बल्कि सामाजिक संरचना और विचारधारा से है- रूपरेखा वर्मा
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता के तौर पर रूपरेखा वर्मा जी ने कहा कि शुरू से ही औरतें जीत का सामान समझी जाती रही हैं इस सोच में बदलाव की ज़रूरत है। महिलाओं की लड़ाई पुरुषों से नहीं है बल्कि सामाजिक संरचना और विचारधारा से है जिसने औरत को देवी बना दिया। आज़ादी के बाद 76 सालों में नारी मुक्ति के आंदोलनों के जो भी फायदा महिलाओं को मिला था उसे पिछले 12 सालों में उलट दिया गया है। आज बलात्कारियों को मालाएँ पहनाई जाती हैं, खुले मंच से रेप की धमकियां दी जाती हैं तो कहाँ है कानून और संविधान? कानूनी फैसले भी अब ईश्वर से पूछकर दिए जा रहे हैं तो सवाल उठता है कि देश खत्म हो चुका है उसे दोबारा कैसे बनाया जाए।
वोमेन्स डे का बाजारीकरण – आद्या लाल
एडवोकेट रूबी में कहा कि महिलाओं पर धर्म के नाम पर घर की इज़्ज़त थोप दी गई है जिसे वे ढोती हैं, इस तरह महिलाओं के खिलाफ अपराध को लीगल किया जा रहा है। समाजसेवी गीता गंगोत्री ने अपनी बात रखते हुए कहा कि सरकारी स्कूल बंद होंगे तो बच्चे संस्कार केंद्रों में जाएँगे शिक्षा के अभाव में अपराधीकरण को बढ़ावा मिलेगा। सबसे कम उम्र की वक्ता के रूप में आद्या लाल ने भी अपनी बात रखी और कहा कि भारत में इस दिन को मनाने का कोई मतलब नहीं जब तक हम अपनी सोच को एक्शन में नहीं बदलते। वोमेन्स डे का बाजारीकरण कर दिया गया है जिसमें हम होली में महिलाओं के साथ कि जाने वाली अभद्रता को भूल जाते हैं।
International Women’s Day: ये हैं देश की 6 साहसी महिलाएं जिन्होंने बदल दिया इतिहास
इनके अलावा शालिनी श्रीवास्तव, प्रियंका शुक्ला, सुमित्रा रावत, सीमा सरोज, ज्योति रावत, रामवती, साबित पॉल, रंजना भारती आदि ने भी अपनी बात रखी। अंत में संगीता रावत ने धन्यवाद ज्ञापन देते हुए कहा कि विदेशी महिलाएँ तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के चलते ज़्यादा आगे बढ़ गयी हैं भारतीय महिलाओं के मुकाबले। पहले की सरकारों के पास फैमिली प्लानिंग के सार्थक प्रोग्राम थे लेकिन आज की सरकार ने महिलाओं को बच्चे पैदा करने की मशीन बना दी गई हैं।
वूमेंस डे पर देशभर की महिलाओं का जुटान
तीन घंटे (शाम 6 से 9 बजे तक) चले इस गूगल मीट आयोजन में अलग-अलग राज्यों जैसे दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ आदि से सरला चंदन, राजरानी चंदन, रश्मि राज, पूजा शाह, रखी कुमारी, सोनी, रामवती, जीतेन्द्र कुमार, प्रियंका शुक्ला एक्टिविस्ट आदि ने कार्यक्रम में शिरकत की।

