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बंगाल में क्यों नहीं दिखे अखिलेश, गठबंधन में दरार या कोई और बात

Akhilesh Mamta Election Strategy 2026: बंगाल चुनाव के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ममता बनर्जी को सोशल मीडिया पर समर्थन तो दिया मगर चुनावी मैदान में नजर क्यों नहीं आए। जनता को डिजिटल समर्थन जरूर मिला, मगर जमीनी स्तर पर उनकी उपस्थिति नहीं दिखाई दी। ऐसे में लोगों में यह जिज्ञासा बढ़ गई कि क्या यह किसी रणनीति का हिस्सा था या सिर्फ संयोग।

शुरुआत में उम्मीदें बढ़ी थी

जनवरी में अखिलेश और ममता की मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में उम्मीदें बढ़ा दी थीं। माना जा रहा था कि दोनों के बीच तालमेल चुनाव प्रचार में भी नजर आएगा। कोलकाता में हुई यह मुलाकात यह संकेत दे रही थी कि सहयोग जनता तक पहुंच सकता है।

अचानक पीछे हटना और इसके कारण

जैसे ही चुनावी गतिविधियाँ तेज हुईं, अखिलेश अचानक पीछे हट गए। जबकि तेजस्वी यादव, हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल जैसे नेता बंगाल में सक्रिय प्रचार कर रहे थे। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है इंडिया गठबंधन में अंदरूनी खींचातान। कांग्रेस और टीएमसी भले ही राष्ट्रीय मंच पर साथ दिख रही थीं, बंगाल में दोनों आमने-सामने थीं।

राहुल गांधी के हमलों के बीच अगर अखिलेश खुले तौर पर टीएमसी का समर्थन करते तो यूपी में उनके और कांग्रेस के संबंध प्रभावित हो सकते थे। इसीलिए उन्होंने संतुलित रणनीति अपनाई।

बैलेंसिंग पॉलिटिक्स का असर

अखिलेश ने दूरी भी बनाई और पूरी तरह गायब भी नहीं रहे। सोशल मीडिया के माध्यम से समर्थन जारी रखा। इससे ममता बनर्जी के साथ संबंध बने रहे और यूपी में भविष्य के राजनीतिक संभावनाएं भी सुरक्षित रहीं। 2027 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए यह रणनीति सपा और कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

योगी फैक्टर और प्रचार का असर

सियासी चर्चा में यह भी सामने आया कि योगी आदित्यनाथ के चुनावी प्रभाव ने भाजपा को फायदा पहुंचाया। वहीं अखिलेश के प्रचार को विपक्षी खेमे में कम प्रभावी बताया गया। ऐसे में बंगाल में चुनावी मैदान में उतरना उनके लिए जोखिम भरा हो सकता था।

संपूर्ण तस्वीर देखें तो अखिलेश ने ऐसा रास्ता चुना जिसमें समर्थन भी बना रहे और जोखिम कम रहे। अगर टीएमसी अच्छा प्रदर्शन करती है तो इसका लाभ डिजिटल समर्थन के माध्यम से मिल सकता है। और अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आए तो जिम्मेदारी सीधे उन पर नहीं आएगी।

जयंत के बदले सुर: अब सिर्फ ‘सहयोगी’ नहीं, ‘किंगमेकर’ बनने की तैयारी

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह रणनीति सफल होगी और डिजिटल समर्थन का प्रभाव वास्तविक चुनाव में भी नजर आएगा। क्या सपा का यह फासला सही समय पर फायदा देगा या यह अधूरा दांव साबित होगा।

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