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अब सरकारी स्कूल के शिक्षक और अधिकारी नहीं कर पाएंगे मनमानी, UP सरकार ने अभिभावकों को दे दी ये ‘सुपरपावर’

उत्तर प्रदेश के सरकारी माध्यमिक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता के लिए एक बेहद जरूरी और बड़ी खुशखबरी है। अगर आप भी अक्सर अपने बच्चों के स्कूल में शिक्षकों की कमी, टूटी बेंच, साफ-सफाई या पढ़ाई के स्तर को लेकर परेशान रहते थे, तो अब आपकी यह चिंता हमेशा के लिए दूर होने वाली है। योगी सरकार प्रदेश के शिक्षा सिस्टम में एक ऐसा क्रांतिकारी बदलाव करने जा रही है, जिससे अब स्कूल सिर्फ शिक्षकों और अधिकारियों के भरोसे नहीं चलेंगे, बल्कि आपके बच्चों की पढ़ाई और स्कूल के विकास की कमान सीधे आपके हाथों में होगी।

1 जुलाई से शुरू हो रहा बड़ा मिशन: अभिभावक बनेंगे स्कूल के असली ‘बॉस’

उत्तर प्रदेश सरकार आगामी 1 जुलाई से प्रदेश के सभी राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (SMC) यानी विद्यालय प्रबंध समिति का गठन शुरू करने जा रही है। इस नई नीति की सबसे बड़ी और खास बात यह है कि इस समिति में कुल 75 प्रतिशत सदस्य खुद विद्यार्थियों के माता-पिता यानी अभिभावक होंगे। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि स्कूल में क्या सुधार होना चाहिए, बच्चों की पढ़ाई का स्तर कैसा हो, अनुशासन और सुविधाएं कैसी हों, इन सभी बड़े फैसलों में अब अभिभावकों की सीधी भागीदारी और मंजूरी अनिवार्य होगी।

माताओं को मिला 50% आरक्षण: जानिए क्या होगी समिति की ताकत

इस नई व्यवस्था को पूरी तरह पारदर्शी और जमीनी बनाने के लिए सरकार ने महिलाओं को इसमें 50 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व दिया है, ताकि बच्चों की शिक्षा में माताओं की भागीदारी बराबर सुनिश्चित हो सके। इतना ही नहीं, इस पूरी कमेटी का अध्यक्ष भी किसी शिक्षक या अधिकारी को नहीं, बल्कि किसी एक अभिभावक को ही चुना जाएगा। अब अगर स्कूल में मिड-डे मील की क्वालिटी खराब हो, शौचालय या पीने के पानी की दिक्कत हो, या फिर पढ़ाई ठीक से न चल रही हो, तो आपको सिर्फ शिकायतकर्ता बनकर नहीं बैठना होगा। आप खुद इस समिति के जरिए सीधे बड़े अधिकारियों के सामने बात रखकर उनका तुरंत समाधान करवा सकेंगे।

छात्र संख्या के हिसाब से तय होंगे सदस्य: 2 साल का होगा कार्यकाल

इस नई गाइडलाइन के अनुसार स्कूलों में छात्रों की संख्या के आधार पर कमेटी के सदस्यों की संख्या तय की गई है। जिन स्कूलों में 100 तक छात्र हैं वहां 15 सदस्य, जहां 101 से 500 तक छात्र हैं वहां 20 सदस्य और जिन स्कूलों में 500 से अधिक छात्र हैं वहां 25 सदस्यों की टीम बनेगी। इस पूरी समिति का कार्यकाल 2 वर्ष का होगा। इसके साथ ही स्कूल के भवन निर्माण, रखरखाव और शिक्षा व्यवस्था की बारीक निगरानी के लिए अलग-अलग उप-समितियां (Sub-Committees) भी गठित की जाएंगी, जिससे हर काम की नियमित समीक्षा हो सके और जिम्मेदारी तय की जा सके।

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क्या बदल जाएगी यूपी के सरकारी स्कूलों की तस्वीर और तकदीर?

सरकार का दावा है कि इस बड़े कदम से सरकारी स्कूलों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता आएगी, बच्चों की उपस्थिति में सुधार होगा और शिक्षा की गुणवत्ता काफी बेहतर हो जाएगी। यह पहल स्कूल और परिवार के बीच एक मजबूत पुल का काम करेगी। हालांकि, किसी भी योजना की असली सफलता कागजों से ज्यादा उसके जमीन पर लागू होने पर निर्भर करती है। अब देखना यह होगा कि 1 जुलाई से शुरू होने जा रही अभिभावकों की यह नई जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की तस्वीर कितनी जल्दी और कितनी मजबूती से बदल पाती है।

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