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30 साल का दबदबा और अब खाली कुर्सी, जानें आजम खान की कमी सपा को पड़ेगी कितनी भारी

West UP Vote Bank Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सबसे बड़ा सवाल यह बन गया है कि समाजवादी पार्टी (सपा) अपने पारंपरिक वोट आधार को कैसे संभालेगी। खासकर पश्चिमी यूपी में जहां मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है, वहां स्थिति धीरे-धीरे बदलती दिखाई दे रही है।

इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह आजम खान की सक्रिय राजनीति से दूरी मानी जा रही है। लंबे समय तक वे इस क्षेत्र में सपा की मजबूत कड़ी रहे।

आजम खान का राजनीतिक असर और घटती सक्रियता

आजम खान करीब तीन दशकों तक सपा की पश्चिमी यूपी रणनीति का अहम हिस्सा रहे। रामपुर सदर सीट से वे 10 बार विधायक चुने गए। 1993 से 2022 तक उनकी निरंतर जीत ने उन्हें पार्टी का भरोसेमंद चेहरा बना दिया।

2022 के चुनाव में जेल में रहते हुए भी उनकी जीत ने यह दिखाया कि उनका प्रभाव केवल प्रचार तक सीमित नहीं था, बल्कि वोट में भी बदल जाता था।

लेकिन बाद में आए उपचुनाव में जब उनकी सीट बीजेपी के खाते में चली गई तो यह संकेत मिला कि उनके बिना सपा की पकड़ कमजोर हो सकती है।

2027 चुनाव और “पोस्ट आजम” चुनौती

अब स्थिति बदल चुकी है। कानूनी मामलों और सजा के चलते यह माना जा रहा है कि आजम खान 2027 का चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। इसी वजह से सपा के सामने एक नया दौर शुरू हो रहा है, जिसे कई लोग “पोस्ट आजम राजनीति” कह रहे हैं।

पार्टी ने रामपुर और आसपास के इलाकों में संगठन को फिर से मजबूत करने की कोशिश शुरू की है। लगभग नौ नए चेहरों को आगे लाने की रणनीति भी अपनाई जा रही है।

लेकिन असली सवाल यही है कि क्या इनमें से कोई नेता आजम खान जैसी पकड़ बना पाएगा।

मुस्लिम वोट बैंक में बदलाव की आशंका

  • लंबे समय तक मुस्लिम वोट सपा के साथ एकजुट माना जाता था। लेकिन अब इसमें बदलाव के संकेत दिख रहे हैं।
  • असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम, चंद्रशेखर आजाद की राजनीतिक गतिविधियां और बसपा जैसे विकल्प इस वोट बैंक में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
  • राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर मुस्लिम वोट 5 से 10 प्रतिशत भी इधर-उधर होता है तो इसका असर 10 से 15 सीटों तक पड़ सकता है।

पश्चिमी यूपी के जिले क्यों हैं अहम

रामपुर, मुरादाबाद, संभल और बिजनौर जैसे जिले सपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यही इलाके अब सबसे ज्यादा राजनीतिक संवेदनशीलता दिखा रहे हैं।

अगर यहां वोटों का संतुलन बिगड़ता है तो इसका सीधा असर पूरे चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है।

पार्टी की नई रणनीति और अंदरूनी चुनौती

अखिलेश यादव निरंतर यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि पार्टी आजम खान के साथ खड़ी है। हाल की मुलाकातों और सार्वजनिक संदेशों को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

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इसके बावजूद पार्टी के सामने एक बड़ी चुनौती है। वह यह कि मुस्लिम समाज में भरोसा बनाए रखने के लिए नया नेतृत्व कैसे तैयार किया जाए।

कुछ समर्थकों में यह भावना भी दिख रही है कि पार्टी धीरे-धीरे आजम खान परिवार से दूरी बना रही है। इससे असंतोष बढ़ सकता है।

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