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Teachers Day 2026: जानें बदलती गुरु-शिष्य परंपरा के बीच क्यों आज भी अनमोल है गुरु का मार्गदर्शन

Teachers Day 2026: कबीर दास का प्रसिद्ध दोहा—”गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”—सदियों से समाज में शिक्षक के सर्वोच्च स्थान को रेखांकित करता रहा है। गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर इसलिए माना गया है, क्योंकि वही व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश और अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने का मार्ग दिखाते हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस यानी शिक्षक दिवस के अवसर पर यह विमर्श अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि आधुनिक समाज में गुरु और शिष्य की भूमिका किस दिशा में जा रही है।

बदलते दौर में गुरु-शिष्य परंपरा का स्वरूप

प्राचीन काल में जहां एकलव्य द्वारा गुरु दक्षिणा में अपना अंगूठा समर्पित करने जैसी अगाध श्रद्धा के उदाहरण मिलते थे, वहीं आज का संबंध काफी हद तक औपचारिकताओं और रस्म अदायगी तक सीमित होता दिख रहा है। वर्तमान परिदृश्य में दोनों ही पक्षों में बड़े बदलाव देखे गए हैं। पहले शिक्षक के अनुशासन और डांट-फटकार के पीछे भी शिष्य के सर्वांगीण विकास का भाव छिपा होता था। आज कानूनी प्रावधानों, अभिभावकों के अति-संवेदनशील रवैये और बदलते सामाजिक माहौल के चलते शिक्षक सख्त अनुशासन का जोखिम उठाने से बचते हैं। वहीं दूसरी ओर शिक्षकों की पेशेवर निष्ठा और आचरण को लेकर भी कई सवाल खड़े होते रहे हैं, जिससे स्पष्ट है कि संतुलन की कमी दोनों पक्षों में देखने को मिल रही है।

जीवन शिल्पकार के रूप में गुरु की महत्ता

भारतीय दर्शन में गुरु और शिष्य के संबंध को कुम्हार और मिट्टी के सुंदर रूपक से समझाया गया है। जिस प्रकार कुम्हार भीतर से सहारा देकर बाहर से हल्की चोट से घड़े को सही आकार देता है, ठीक उसी तरह गुरु शिष्य की कमियों और विकारों को दूर कर उसके व्यक्तित्व को गढ़ते हैं। गुरु केवल किताबी ज्ञान नहीं देते, बल्कि ईमानदारी, अनुशासन और विनम्रता जैसे जीवन मूल्य सिखाकर एक जिम्मेदार नागरिक का निर्माण करते हैं।

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हर क्षेत्र में मार्गदर्शन की अनिवार्यता

किसी भी क्षेत्र में सफलता की नींव सही मार्गदर्शन पर टिकी होती है। एक कुशल कोच के बिना किसी खिलाड़ी की स्वाभाविक प्रतिभा को सही दिशा नहीं मिल पाती, संगीतकार का हुनर गुरु के समर्पण के बिना तराशा नहीं जा सकता और आध्यात्मिक मार्ग पर साधक गुरु के बिना आत्मज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। जीवन की प्रथम गुरु माता होती हैं और उसके बाद जीवन के विभिन्न चरणों में मिलने वाले शिक्षक, प्रशिक्षक और मार्गदर्शक व्यक्ति को सही और गलत का विवेक देते हैं। मानसिक तनाव, भ्रम और जीवन के संघर्षों के समय गुरु का सान्निध्य आंतरिक शांति और संतुलन बनाए रखने में सबसे बड़ा संबल साबित होता है।

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