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यूपी 2027 का गेमप्लान तैयार, अखिलेश ने तय किया कांग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगी

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से बयानों से ज्यादा मजबूत सामाजिक और चुनावी गठजोड़ के आधार पर तय होती रही है। लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के विजय रथ को रोकने वाला ‘इंडिया’ गठबंधन अब 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की चौखट पर खड़ा है।

हालांकि, चुनाव से काफी पहले ही गठबंधन के भीतर सीट शेयरिंग को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच खींचतान तेज हो गई है। राजनीतिक गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने सीट बंटवारे का एक नया ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया है, जो कांग्रेस के पाले में गेंद डालता दिख रहा है।

सपा का ‘328 बनाम 75’ फॉर्मूला: क्या कांग्रेस करेगी स्वीकार?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, समाजवादी पार्टी ने राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 328 सीटों पर अपने सिंबल साइकिल के साथ प्रत्याशी उतारने का मन बना लिया है। बाकी बची 75 सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ने की पेशकश की गई है। सपा के रणनीतिकारों का मानना है कि राज्य में कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा सीमित है, इसलिए उसे 75 से अधिक सीटें देना व्यावहारिक नहीं होगा। वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस के राज्य प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम पार्टी के लिए 200 सीटों की मांग पर अड़े हुए हैं, जिससे दोनों दलों के बीच रस्साकस्सी बढ़ गई है।

लोकसभा के 17 सीटों के समीकरण पर सपा का नया तर्क

सपा सूत्रों के मुताबिक, पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 17 सीटें दी गई थीं, जिनमें से उसने 5 सीटों पर जीत दर्ज की थी। यदि प्रति लोकसभा क्षेत्र पांच विधानसभा सीटों का पैमाना भी माना जाए तो 85 सीटें बनती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत को देखते हुए सपा 75 से ज्यादा सीटें देने के पक्ष में नहीं है।

सपा का आकलन है कि यूपी के कई जिलों में कांग्रेस की संगठनात्मक उपस्थिति बेहद कमजोर है। इसलिए रणनीति यह भी बनाई जा रही है कि कुछ चिन्हित सीटों पर सपा के जिताऊ नेताओं को कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर मैदान में उतारा जाए ताकि गठबंधन का संतुलन बना रहे।

रायबरेली, अमेठी और शहरी सीटों पर कांग्रेस को मौका देने की योजना

सीट आवंटन के तहत कांग्रेस को मुख्य रूप से उन चुनिंदा जिलों में प्राथमिकता दी जा सकती है जहां उसका प्रभाव माना जाता है। इनमें रायबरेली, अमेठी, सहारनपुर, प्रयागराज, सीतापुर और बाराबंकी जैसे जिले शामिल हैं, जहां कांग्रेस को प्रति जिला दो से तीन सीटें मिल सकती हैं।

इसके अलावा सपा उन कमजोर और शहरी सीटों को भी कांग्रेस के खाते में डालने पर विचार कर रही है, जहां परंपरागत रूप से साइकिल चुनाव चिन्ह का प्रदर्शन कमजोर रहा है। अखिलेश यादव चाहते हैं कि सीट शेयरिंग का यह अध्याय सितंबर के अंत तक पूरी तरह सुलझ जाए, ताकि चुनावी तैयारियों में कोई अनावश्यक विलंब न हो।

2017 की गलतियों से सबक और 2029 की लंबी रणनीति

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस को 105 सीटें दी थीं, लेकिन समन्वय की कमी के कारण 9 सीटों पर दोनों दलों के प्रत्याशी आमने-सामने लड़ पड़े थे, जिसका सीधा सियासी फायदा भाजपा को मिला था। सपा इस बार उस गलती को दोहराना नहीं चाहती।

टीवीके का ‘विजय फॉर पीएम’ अभियान बना कांग्रेस के गले की फांस, गठबंधन में मची खलबली

वहीं राष्ट्रीय स्तर पर सीमित राज्यों तक सिमट चुकी कांग्रेस के लिए भी यूपी में सपा के साथ रहना जरूरी माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि गठबंधन में दरार आती है और दोनों दल अलग लड़ते हैं, तो मुस्लिम और गैर-भाजपा मतों के बिखराव का सीधा लाभ सत्तारूढ़ एनडीए को मिलेगा। अब देखना यह है कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव इस 75 सीटों के फार्मूले पर अंतिम मुहर लगाते हैं या सीटों का यह घमासान नया मोड़ लेगा।

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