क्या सिर्फ चेहरा बदलने से UP जीत लेगी कांग्रेस, जानें आराधना मिश्रा ‘मोना’ के कांटों भरे ताज का कड़वा सच
‘दिल्ली की गद्दी का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है’- भारतीय राजनीति में यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि सत्ता का सबसे बड़ा सत्य है। 80 लोकसभा सीटों वाले देश के सबसे बड़े सूबे में जिस राजनीतिक दल की जड़ें गहरी होती हैं, केंद्र की सियासत में उसी का दबदबा कायम होता है।
इसी अहमियत को देखते हुए आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में अपना खोया हुआ सियासी वजूद तलाशने के लिए एक बार फिर बड़ा संगठनात्मक दांव चला है। पार्टी आलाकमान ने अजय राय की जगह रामपुर खास (प्रतापगढ़) से तेजतर्रार विधायक आराधना मिश्रा ‘मोना’ को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है। हालांकि, जमीन पर संगठन की गैर-मौजूदगी और लगातार घटते जनाधार के बीच यह ताज कांटों भरा साबित होने वाला है।
403 सीटों वाली विधानसभा में महज दो विधायक
उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में कांग्रेस की वर्तमान स्थिति बेहद चिंताजनक दौर से गुजर रही है। 403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी के पास महज दो विधायक हैं, जिनमें आराधना मिश्रा ‘मोना’ के साथ नरेंद्र पाल सिंह का नाम शामिल है।
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि इस राज्य में अब कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है। पार्टी पिछले करीब 37 वर्षों से सत्ता के गलियारों से बाहर है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अंतिम मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी (एनडी तिवारी) थे, जिनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद से पार्टी को राज्य में ऐसा कोई सर्वमान्य और प्रभावी जननेता नहीं मिल सका, जो गिरते जनाधार को संभाल पाता।
मंडल-कमंडल ने ध्वस्त की कांग्रेस की सोशल इंजीनियरिंग
आजादी के बाद कई दशकों तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता का सबसे मजबूत आधार उसकी पारंपरिक सोशल इंजीनियरिंग रही, जिसमें ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम मतदाताओं का अटूट त्रिकोण शामिल था। इसी समीकरण के बलबूते पार्टी ने दशकों तक एकछत्र शासन किया।
हालांकि, नब्बे के दशक में उभरी ‘मंडल’ और ‘कमंडल’ की सियासत ने इस आधार को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। लालकृष्ण आडवाणी की ऐतिहासिक रथ यात्रा के बाद जहां सवर्ण व ब्राह्मण मतदाता मुख्य रूप से भाजपा के साथ जुड़े, वहीं मुस्लिम वोट बैंक समाजवादी पार्टी और दलित समुदाय बहुजन समाज पार्टी की ओर लामबंद हो गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता लंबे समय तक सपा और बसपा के इर्द-गिर्द घूमती रही, जबकि कांग्रेस हाशिए पर चली गई।
स्टार चेहरों का जादू रहा बेअसर, राहुल के भरोसे नैया
चुनावी पुनर्जीवन के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने समय-समय पर बड़े प्रयोग किए, लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे। गांधी परिवार का मजबूत चेहरा मानी जाने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा का व्यापक अभियान भी मतदाताओं को आकर्षित करने में नाकाम रहा, जबकि पूर्व में अभिनेता से नेता बने राज बब्बर की अगुवाई को भी जनता ने नकार दिया।
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संगठन की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि भाजपा जिस तरह बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का मजबूत संजाल खड़ा करती है, उसके मुकाबले कांग्रेस के पास समर्पित कैडर और कार्यकर्ताओं की भारी कमी है। अतीत में प्रभात फेरियां निकालने और जन-जन से सीधा संवाद करने वाली पार्टी आज जमीनी स्तर पर लगभग निष्क्रिय नजर आती है। पार्टी का पूरा प्रचार तंत्र अब केवल राहुल गांधी के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जो जमीनी वास्तविकताओं से कटे होने के आरोपों से घिरे रहते हैं।
संगठनात्मक ढांचा बने बिना केवल चेहरा बदलना काफी नहीं
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में केवल नेतृत्व या प्रदेश अध्यक्ष का चेहरा बदल देने से पार्टी की किस्मत नहीं पलट सकती। आराधना मिश्रा ‘मोना’ बेशक एक जुझारू, अनुभवी और लोकप्रिय विधायक हैं, लेकिन जब तक पार्टी निचले स्तर पर पन्ना प्रमुख और बूथ कमेटियों को पुनर्जीवित नहीं करती, तब तक कोई भी चुनावी चमत्कार संभव नहीं दिखता। जब तक समर्पित और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की फौज तैयार कर घर-घर तक संपर्क अभियान नहीं चलाया जाता, तब तक कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में 37 साल से चला आ रहा राजनीतिक सूखा समाप्त करना बेहद कठिन चुनौती बनी रहेगी।

