पंजाब से बिहार तक बेखौफ घूसखोरी: इधर ADM के घर 70 लाख कैश, उधर SHO का ‘जेल ज्ञान’!
भारत में प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर एक जुमला लंबे समय से कड़वी हकीकत बनकर गूंजता रहा है—’रिश्वत लेते पकड़े जाओ, रिश्वत दो और छूट जाओ।’ हाल के दिनों में पंजाब से लेकर बिहार तक सामने आए मामलों ने यह साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार की जड़ें महकमों में कितनी गहरी हैं और भ्रष्ट अधिकारियों के भीतर कानूनी कार्रवाई का डर किस कदर खत्म हो चुका है। पंजाब पुलिस की महिला अधिकारी सुनीता बावा का वायरल वीडियो और बिहार में अपर जिलाधिकारी (एडीएम) के ठिकानों से मिला अकूत कैश इसी प्रशासनिक गिरावट की गवाही दे रहे हैं।
बेपरवाह मुस्कान और जेल को ‘नया मॉड्यूल’ बताने की ढिठाई
पंजाब के मोगा जिले के कोट ईसा खान थाने की पूर्व एसएचओ इंस्पेक्टर सुनीता बावा को कुछ दिन पहले विजिलेंस ब्यूरो की टीम ने पचास हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। आरोप है कि उन्होंने शिकायतकर्ता राजविंदर सिंह को ड्रग्स (एनडीपीएस) के झूठे केस में फंसाने की धमकी देकर पचास हजार रुपये पहले ऐंठे और फिर पचास हजार की अतिरिक्त मांग कर रही थीं। गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो ने लोगों को स्तब्ध कर दिया।
हथकड़ी लगने के बावजूद पत्रकारों के सवालों पर मुस्कुराते हुए सुनीता बावा ने बेहद बेशर्मी भरे लहजे में कहा कि “जेल का एक नया मॉड्यूल शुरू हो गया है, देखते हैं क्या होता है… जिंदगी में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, अच्छे की उम्मीद रखनी चाहिए।” यह बयान इस बात का सीधा प्रमाण है कि आरोपी अधिकारी को अपने कृत्य का कोई मलाल नहीं है। यह बेपरवाही या तो उनके ऊंचे राजनीतिक-प्रशासनिक रसूख से आती है या फिर सिस्टम के लचर होने के उस भरोसे से, जहां ‘जुगाड़’ के रास्ते बाहर आना आसान माना जाता है।
पंजाब में नशा तस्करी और खाकी पर दाग
पंजाब लंबे समय से सीमा पार पाकिस्तान से होने वाली नशा तस्करी की विभीषिका झेल रहा है। जमीनी स्तर पर यह आरोप अक्सर लगते रहे हैं कि तस्करों को पुलिस और तंत्र के भ्रष्ट तत्वों का संरक्षण मिलता है। जब थाने की कमान संभालने वाली महिला अधिकारी ही निर्दोष नागरिकों को झूठे ड्रग केस में फंसाने की धमकी देकर उगाही करने लगें, तो नशे के खिलाफ लड़ी जा रही सरकारी जंग की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
कानून की बारीकियों से वाकिफ ऐसे अधिकारियों को बखूबी पता होता है कि विजिलेंस जांच से लेकर कोर्ट में दोष साबित होने तक की प्रक्रिया कितनी लंबी और पेचीदा है। अदालतों में मुकदमों की धीमी गति और साक्ष्यों के अभाव में केस कमजोर पड़ने का फायदा उठाकर कई भ्रष्ट चेहरे समय के साथ बच निकलते हैं, जबकि ईमानदारी से काम करने वाले अफसरों को अक्सर साइडलाइन या प्रताड़ित कर दिया जाता है।
बिहार में एडीएम के घर से 70 लाख कैश और संपत्तियों का जखीरा
भ्रष्टाचार का यह खेल केवल पंजाब तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार में भी जांच एजेंसियों के रडार पर बड़े नौकरशाह आए हैं। पटना में अपर जिलाधिकारी (आपूर्ति) रविंद्र कुमार दिवाकर के ठिकानों पर स्पेशल विजिलेंस यूनिट और विजिलेंस इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो ने आय से अधिक संपत्ति मामले में छापेमारी की। तलाशी के दौरान अधिकारियों के होश उड़ गए, जब एडीएम के आवास से 70 लाख रुपये से अधिक की बेहिसाब नकदी और लगभग 6 लाख रुपये मूल्य की ब्रांडेड घड़ियां बरामद हुईं।
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जांच के दायरे में केवल एडीएम ही नहीं, बल्कि उनकी पत्नी स्वीटी भी आ गई हैं, जो स्वयं सरकारी सेवा में सब-रजिस्ट्रार के पद पर तैनात हैं। एक ही परिवार में प्रशासनिक और निबंधन जैसे मलाईदार पदों पर बैठकर अवैध संपत्ति जुटाने का यह सिंडिकेट तंत्र के सड़ांध को दर्शाता है।
बेरोजगारी के दौर में मलाईदार कुर्सियों की बेलगाम भूख
एक तरफ जहां देश का पढ़ा-लिखा युवा रोजगार और एक अदद नौकरी के लिए वर्षों संघर्ष कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी कुर्सियों और ऊंचे ओहदों पर बैठे भ्रष्ट नौकरशाहों की लालच खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। पंजाब की एसएचओ का बेखौफ रवैया हो या बिहार के एडीएम का अकूत खजाना, ये मामले बताते हैं कि जब तक भ्रष्टाचार निवारण कानूनों के तहत त्वरित सुनवाई और सख्त सजा का डर पैदा नहीं होगा, तब तक रिश्वतखोरी की यह दीमक देश की नींव को खोखला करती रहेगी।

