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मोदी-योगी लहर भी नहीं जीत पाई ये सीट, लेकिन सपा का है दबदबा; यहां पानी मांगती हैं बड़ी-बड़ी राजनीतिक लहरें

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से कई सीटें किसी खास दल का गढ़ मानी जाती हैं, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की संभल सदर सीट की सियासी कहानी सबसे जुदा है। पूरे प्रदेश और देश में मोदी-योगी लहर के बावजूद संभल सदर एक ऐसी सीट रही है जहां भाजपा आज तक अपनी मजबूत जमीन तलाशने के लिए जूझती नजर आई है।

सन् 1993 के बाद से यहां भाजपा का खाता नहीं खुला है, जबकि समाजवादी पार्टी का परचम लगातार लहराता रहा है। आगामी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में यह सीट केवल एक सामान्य निर्वाचन क्षेत्र नहीं, बल्कि सपा के लिए अपने सबसे मजबूत किले की हिफाजत और भाजपा के लिए अपनी राजनीतिक साख साबित करने का सबसे बड़ा रणक्षेत्र बन चुकी है।

संभल सदर का सियासी इतिहास और सपा का अभेद्य किला

संभल सदर विधानसभा के इतिहास पर नजर डालें तो 1952 से लेकर 1980 के दशक तक यहां कांग्रेस, निर्दलीय और बाद में जनता दल व लोकदल का दबदबा रहा। इस सीट पर बड़ा सियासी मोड़ 1993 में आया जब भाजपा के सत्य प्रकाश ने यहां ऐतिहासिक जीत दर्ज की। हालांकि इसके बाद 1996 से यह सीट पूरी तरह समाजवादी पार्टी के खाते में चली गई। सपा के कद्दावर नेता इकबाल महमूद ने 1996 से लेकर 2022 तक लगातार छह बार जीत हासिल कर इस सीट को सपा का अभेद्य दुर्ग बना दिया। इसके साथ ही पूर्व सांसद स्वर्गीय शफीकुर्रहमान बर्क के परिवार का भी इस इलाके में गहरा प्रभाव रहा है। भारी मुस्लिम आबादी और सपा के पारंपरिक वोट बैंक के गठजोड़ ने यहां भाजपा की हर चुनावी लहर को अब तक बेअसर साबित किया है।

कुंदरकी फॉर्मूला और BJP का नया चक्रव्यूह

कुंदरकी विधानसभा उपचुनाव में मिली अप्रत्याशित जीत के बाद भाजपा का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। संभल सदर को फतह करने के लिए पार्टी ने अपनी रणनीति में बुनियादी बदलाव किए हैं। भाजपा क्षेत्रीय अध्यक्ष नवाब सिंह नागर के हालिया दौरों और संगठन की नई रूपरेखा से साफ है कि पार्टी इस बार केवल पारंपरिक मुद्दों पर निर्भर नहीं है। भाजपा ने जाट मतदाताओं को साधने के लिए हरेंद्र सिंह रिंकू जैसे स्थानीय चेहरों को आगे बढ़ाया है, वहीं गैर-मुस्लिम वोटों के मुकम्मल ध्रुवीकरण के साथ-साथ पसमांदा मुस्लिम तबके को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से जोड़कर सपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति तैयार की है। इसके अलावा बूथ स्तर पर पन्ना प्रमुखों की सक्रियता और स्थानीय निकायों में कार्यकर्ताओं की भागीदारी बढ़ाकर जमीनी पकड़ मजबूत की जा रही है।

चुनावी नरेटिव: जामा मस्जिद विवाद, कानून-व्यवस्था और विकास

संभल का चुनावी माहौल स्थानीय संवेदनशील मुद्दों के इर्द-गिर्द भी गरमाया हुआ है। वर्ष 2024 की हिंसा और ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद विवाद, जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट और न्यायिक आयोग के स्तर पर चर्चा में है, दोनों दलों के लिए भावनात्मक और राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन चुका है। इसके अतिरिक्त योगी सरकार की सख्त कानून-व्यवस्था, बुलडोजर मॉडल और मदरसों के सत्यापन से जुड़े फैसले जहां एक वर्ग में ध्रुवीकरण का आधार बन रहे हैं, वहीं सपा इसे प्रशासनिक ज्यादती बताकर भुना रही है। दूसरी तरफ युवाओं के रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और महिला सुरक्षा जैसे जमीनी मुद्दे भी चुनावी नैरेटिव में प्रमुखता से शामिल हैं।

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AIMIM की एंट्री और 2027 का त्रिकोणीय पेंच

सपा के लिए यह मुकाबला इस बार केवल भाजपा से ही नहीं बल्कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM की सक्रियता से भी पेचीदा होता दिख रहा है। संभल में AIMIM की बढ़ती हलचल और स्थानीय मुस्लिम नेताओं, विशेषकर मुशीर चौधरी से सपा विधायक इकबाल महमूद की तीखी जुबानी जंग ने वोटों के संभावित बिखराव का खतरा बढ़ा दिया है। इकबाल महमूद जहां विरोधी खेमे पर भाजपा को फायदा पहुंचाने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं मुस्लिम मतों में संभावित विभाजन भाजपा के लिए राह आसान करने की उम्मीद जगा रहा है। 2027 का महामुकाबला यह तय करेगा कि इकबाल महमूद अपनी तीन दशक पुरानी विरासत बचा पाते हैं या फिर भाजपा का सोशल इंजीनियरिंग मॉडल संभल में नया इतिहास रचता है।

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