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UP Election 2027: आगरा में BJP का किला, क्या सपा बदल पाएगी पूरा सियासी समीकरण

उत्तर प्रदेश की सियासत में ताजनगरी आगरा सिर्फ पर्यटन का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का सबसे मजबूत राजनीतिक दुर्ग माना जाता है। पिछले दो विधानसभा चुनावों (2017 और 2022) के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि यहां बीजेपी का जमीनी संगठन और सामाजिक ताना-बाना बेहद सुदृढ़ है।

दोनों ही बार बीजेपी ने जिले की सभी 9 की 9 विधानसभा सीटों पर भगवा फहराकर विपक्ष का पूरी तरह सूपड़ा साफ कर दिया था। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी ने आगरा और फतेहपुर सीकरी दोनों संसदीय क्षेत्रों में अपना परचम लहराया। हालांकि, 2027 के महामुकाबले से पहले सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बीजेपी कितनी मजबूत है, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी (सपा) और विपक्ष यहां के जटिल सामाजिक समीकरणों को साधकर इस किले में कोई दरार पैदा कर पाएंगे।

शहरी सीटों पर सवर्ण और व्यापारी वर्ग का अटूट भरोसा

आगरा शहर की सीटों पर नजर डालें तो यहां का कोर वोट बैंक पारंपरिक रूप से बीजेपी के साथ चट्टान की तरह खड़ा रहा है। आगरा उत्तर विधानसभा सीट पर व्यापारी और सवर्ण मतदाताओं का भारी दबदबा है। साल 2022 के चुनाव में बीजेपी ने यहां करीब 64.3% रिकॉर्ड वोट शेयर हासिल किया था और 1,12,000 से भी अधिक वोटों के भारी-भरकम अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी।

वहीं, आगरा दक्षिण सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की खासी तादाद होने के बावजूद वैश्य, ब्राह्मण और दलित मतों के ध्रुवीकरण के चलते बीजेपी ने 56,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से एकतरफा जीत दर्ज की थी। शहरी मिजाज वाली इन सीटों पर विपक्षी दलों के लिए बीजेपी के मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाना हमेशा से सबसे कठिन चुनौती रहा है।

सुरक्षित सीटों और ग्रामीण इलाकों में दलित-ओबीसी समीकरण

आगरा कैंट (सुरक्षित) सीट पर दलित आबादी के साथ सवर्ण और मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जहां 2022 में बीजेपी ने करीब 48,697 मतों के अंतर से जीत हासिल की थी। वहीं, आगरा ग्रामीण विधानसभा सीट पर दलित मतों के अलावा जाट, राजपूत और ओबीसी बिरादरियों का गहरा प्रभाव है। इस सीट से बीजेपी की वरिष्ठ नेता बेबी रानी मौर्य ने 52.9% वोट शेयर जुटाते हुए करीब 76,000 वोटों की प्रचंड बढ़त के साथ जीत का परचम लहराया था। इन सुरक्षित और अर्ध-शहरी सीटों पर बीजेपी ने गैर-जाटव दलित और ओबीसी जातियों का ऐसा मजबूत सामाजिक गठबंधन तैयार किया है, जिसने विपक्षी रणनीति को हर बार पस्त किया है।

फतेहपुर सीकरी से बाह तक: देहात में जाट, बघेल और ठाकुर फैक्टर

जिले की ग्रामीण विधानसभा सीटों पर स्थानीय चेहरे, जातीय नेटवर्क और किसानी मुद्दे अहम भूमिका निभाते हैं। 2022 के चुनाव में फतेहपुर सीकरी सीट पर बीजेपी को 46.5% वोट मिले थे, जबकि राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के प्रत्याशी को 26.9% वोटों पर संतोष करना पड़ा था।

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इसी तरह खेरागढ़ सीट पर बीजेपी 36,497 वोटों से जीती, जबकि फतेहाबाद में पार्टी ने 53,000 से अधिक और क्षत्रिय बाहुल्य बाह सीट पर करीब 24,000 मतों के अंतर से विजय हासिल की थी। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी हालांकि बीजेपी ने फतेहपुर सीकरी सीट बचा ली, लेकिन वहां जीत का अंतर घटकर महज 4.2% रह गया था। यह आंकड़ा बताता है कि देहात और जाट बाहुल्य ग्रामीण अंचलों में विपक्ष के लिए मुकाबले की संभावनाएं शहर के मुकाबले कहीं ज्यादा जीवंत हैं।

2027 में सपा के सामने क्या है सबसे बड़ी चुनौती?

2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती सिर्फ मजबूत प्रत्याशी उतारने की नहीं है, बल्कि सूक्ष्म स्तर पर सामाजिक समीकरणों की सिलाई करने की है। सपा को जहां शहर में बीजेपी के व्यापारी और सवर्ण जनाधार के मुकाबले एक नया सामाजिक ताना-बाना बुनना होगा, वहीं ग्रामीण सीटों पर जाट, बघेल, अन्य ओबीसी, दलित और मुस्लिम मतों के बीच एक ठोस तालमेल बैठाना होगा।

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आगरा उत्तर का सवर्ण-व्यापारी आधार, दक्षिण का मुस्लिम-दलित मिश्रण, कैंट का एससी वोट और ग्रामीण आगरा का जाट-ओबीसी-ठाकुर गणित—हर सीट का अपना अलग मिजाज है। 2027 की जंग यह तय करेगी कि क्या विपक्ष इन बिखरे हुए सामाजिक समीकरणों को एक धागे में पिरोकर बीजेपी के अजेय रथ को रोक पाता है, या आगरा एक बार फिर भगवा पार्टी का अभेद्य किला साबित होता है।

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