चुनाव आयोग में सबकुछ ठीक नहीं, जानें क्यों निशाने पर हैं ज्ञानेश कुमार; सामने आई अंदर की बात
देश में एक बार फिर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को लेकर राजनीतिक तापमान चरम पर पहुंच गया है। चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की खबरों के बीच कांग्रेस ने सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी गठबंधन नए सिरे से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की घेराबंदी करने में जुट गया है। राहुल गांधी ने तो सीईसी को पद छोड़ने और सरकारी गवाह बनने तक का मशविरा दे डाला है, जिसके बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है।
चुनाव आयोग में मतभेद के दावों से भड़का नया विवाद
यह ताजा राजनीतिक गतिरोध उस वक्त शुरू हुआ जब मीडिया और सियासी गलियारों में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। रिपोर्ट्स में कहा गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच आंतरिक मतभेद गहरे हो गए हैं। इस खबर को आधार बनाते हुए विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। वहीं कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दो अक्टूबर से राष्ट्रव्यापी आंदोलन का बिगुल फूंकने का ऐलान किया है।
EVM और SIR पर विपक्ष के दोहरे रवैये पर भाजपा का हमला
विपक्ष द्वारा लंबे समय से चुनाव प्रक्रिया, ईवीएम और एसआईआर (SIR) पर उठाए जा रहे सवालों पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा पलटवार किया है। भाजपा का आरोप है कि विपक्ष ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी’ की रणनीति पर चलता है—जब किसी राज्य में विपक्षी दलों की जीत होती है तो ईवीएम और चुनाव आयोग पर कोई सवाल नहीं उठता, लेकिन हार का सामना करते ही पूरी संवैधानिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
गैस सिलेंडर लेते हैं तो ध्यान दें! 1 अक्टूबर से बदल रहा नियम, सीधे जेब पड़ेगा असर
पलटवार के तौर पर भाजपा ने केरल के नेता रमेश चेन्निथला का वह पुराना बयान फिर से सोशल मीडिया पर उजागर किया है, जिसमें उन्होंने माना था कि राज्य में सरकार बनाने में कांग्रेस को एसआईआर प्रक्रिया से काफी मदद मिली थी।
आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मुद्दों की तलाश
उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में अगले वर्ष होने वाले महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस सियासी हलचल को बेहद अहम माना जा रहा है। यूपी में बीते करीब एक दशक से भाजपा काबिज है और सपा-बसपा जैसे क्षेत्रीय दलों के लिए राह कठिन बनी हुई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सत्ता पक्ष को घेरने के लिए ठोस मुद्दों की कमी के चलते विपक्ष एक बार फिर बैलेट पेपर से चुनाव कराने की पुरानी मांग को हवा दे रहा है।
हालांकि, मौजूदा दौर में बैलेट पेपर पर लौटना व्यावहारिक नहीं माना जाता, क्योंकि इससे समय और धन की भारी बर्बादी होगी, जबकि ईवीएम ने बूथ कैप्चरिंग जैसी पुरानी बुराइयों को खत्म कर मतदान और मतगणना को तेज और पारदर्शी बनाया है। ऐसे में सिस्टम की तकनीकी कमियों को सुधारने के बजाय पूरी संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठाने को लेकर बहस छिड़ गई है।

