राहुल के गढ़ में अखिलेश का चक्रव्यूह! रायबरेली में 18 लाख वोटरों पर चला PDA का दांव, अदिति सिंह से मनोज पांडे तक में मची खलबली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ जिले केवल प्रशासनिक सीमाएं नहीं होते, बल्कि वे सीधे-सीधे सियासी रसूख और सत्ता की धुरी का प्रतीक बन जाते हैं। गांधी परिवार का पारंपरिक किला, कांग्रेस का सबसे मजबूत अभेद्य दुर्ग और राष्ट्रीय राजनीति का मुख्य केंद्र रहा रायबरेली आज अचानक सूबे की राजनीति के सबसे बड़े केंद्र में तब्दील हो गया है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछाते हुए रायबरेली की धरती से ऐसा आक्रामक दांव चला है, जिसने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के माथे पर तो शिकन ला ही दी है, साथ ही कांग्रेस के रणनीतिकारों को भी सकते में डाल दिया है। रायबरेली में ‘पीडीए यात्रा’ का शंखनाद कर अखिलेश यादव ने स्पष्ट पैगाम दे दिया है कि 2027 का दंगल केवल भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने गठबंधन सहयोगियों के सामने अपनी स्वतंत्र जमीनी ताकत को सिद्ध करने का भी खुला इम्तिहान है।
18.87 लाख मतदाता और 6 सीटों का गणित: 2022 में सपा ने लगाई थी सेंध
आंकड़ों के आईने में देखें तो रायबरेली जिले में कुल मतदाताओं की तादाद 18.87 लाख (18,87,000 से अधिक) है। जिले के दायरे में छह विधानसभा सीटें आती हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में जब पूरे प्रदेश में कड़ा मुकाबला था, तब रायबरेली के इस सियासी गणित ने सबको हैरान कर दिया था। जिले की छह में से चार सीटों—हरचंदपुर, ऊंचाहार, सरेनी और बछरावां पर समाजवादी पार्टी ने अपना परचम लहराया था, जबकि भाजपा केवल रायबरेली सदर और सलोन सीट ही अपने खाते में डाल सकी थी। सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि जिस जिले को कांग्रेस का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता था, वहां मुख्य चुनावी मुकाबला पूरी तरह सपा और भाजपा के बीच ही सिमटकर रह गया था।
ऊंचाहार में मनोज पांडे और अंदरूनी बगावत पर सपा का शक्ति प्रदर्शन
जिले में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा और सियासी सरगर्मी ऊंचाहार विधानसभा सीट को लेकर देखने को मिल रही है। इस सीट से सपा के कद्दावर नेता मनोज पांडे विधायक हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान उनके भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के करीब जाने और पाला बदलने की अटकलों ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं। ऐसे संवेदनशील माहौल में रायबरेली से पीडीए यात्रा निकालना समाजवादी पार्टी के भीतर एक बड़े आंतरिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है।
सियासी विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव रायबरेली के जरिए यह संदेश देना चाहते हैं कि संगठन का मूल कैडर और जमीनी जनाधार आज भी पार्टी नेतृत्व के साथ चट्टान की तरह खड़ा है। मनोज पांडे को लेकर सपा की सतर्कता इसलिए भी अधिक है क्योंकि इलाके की ब्राह्मण राजनीति में उनकी गहरी पैठ मानी जाती है और सपा 2027 की लड़ाई में किसी भी सूरत में ब्राह्मण समुदाय को खुद से छिटकने नहीं देना चाहती।
अदिति सिंह का किला भेदने की तैयारी: सदर सीट पर नए समीकरण की तलाश
वहीं दूसरी तरफ रायबरेली सदर सीट पर भाजपा का सबसे प्रमुख और मजबूत चेहरा विधायक अदिति सिंह हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में अदिति सिंह ने बेहद कड़े मुकाबले में सपा के प्रत्याशी राम प्रताप यादव को 7,175 मतों के करीबी अंतर से पराजित किया था।
उस चुनाव में सदर सीट पर कुल मतदाताओं की संख्या करीब 3.68 लाख के आसपास थी और कांग्रेस तीसरे स्थान पर खिसक गई थी। इसी नजदीकी हार-जीत को भांपते हुए सपा आलाकमान को लगता है कि यदि पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के मजबूत वोट बैंक के साथ ब्राह्मण समाज और युवा मतदाताओं का थोड़ा सा भी झुकाव सपा के पक्ष में हो गया, तो रायबरेली सदर की सियासी तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
एक तीर से तीन निशाने: अखिलेश यादव की रायबरेली में ट्रिपल स्ट्राइक
रायबरेली में अखिलेश यादव की सक्रियता केवल एक-दो सीटें जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे एक साथ तीन रणनीतिक मोर्चों पर दांव खेल रहे हैं। पहला लक्ष्य पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) के कोर वोट बैंक को एकजुट और अभेद्य बनाना है। दूसरा मोर्चा जिले के प्रबुद्ध ब्राह्मण और सवर्ण समाज को यह भरोसा दिलाना है कि सपा के मंच पर उनके मान-सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी के लिए पूरी जगह है। वहीं तीसरा और सबसे अहम सियासी निशाना कांग्रेस के पारंपरिक गढ़ में सपा की स्वतंत्र ताकत का प्रदर्शन करना है, क्योंकि यदि रायबरेली जैसे हाई-प्रोफाइल जिले में सपा का जनाधार और ज्यादा फैलता है, तो भविष्य में किसी भी संभावित चुनावी गठबंधन के दौरान सपा की सियासी बारगेनिंग पावर (सौदेबाजी की ताकत) कई गुना बढ़ जाएगी।
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पासी, लोधी, यादव, ब्राह्मण और मुस्लिम: जातीय समीकरणों की अग्निपरीक्षा
रायबरेली का सामाजिक और जातीय ताना-बाना बेहद विविधतापूर्ण और निर्णायक है। यहां पासी, लोधी, यादव, ब्राह्मण, ठाकुर और मुस्लिम मतदाताओं की खासी तादाद मौजूद है, जो किसी भी चुनाव का रुख पलटने में सक्षम हैं। यही कारण है कि अखिलेश यादव के ‘पीडीए फार्मूले’ की सबसे असली और कठिन परीक्षा इसी जमीन पर मानी जा रही है। एक तरफ जहां सपा पीडीए के जरिए नया सामाजिक समीकरण गढ़ रही है, वहीं भाजपा अपने मजबूत सवर्ण और गैर-यादव ओबीसी प्रभाव को बचाने के लिए पूरी घेराबंदी कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस भी गांधी परिवार के इस गढ़ में अपनी प्रासंगिकता और हिस्सेदारी को किसी भी कीमत पर कम नहीं होने देना चाहती। आने वाले महीनों में रायबरेली की यह सियासी हलचल ही तय करेगी कि 2027 में उत्तर प्रदेश की सत्ता का ऊंट किस करवट बैठने वाला है।

