दो-दो की बराबरी पर फंसी यूपी की सबसे हॉट सीट, क्या अखिलेश बचा पाएंगे अपना पुश्तैनी सिंहासन
उत्तर प्रदेश की सियासत में जब भी किसी ऐसे अजेय गढ़ की चर्चा होती है जिसे हिलाना नामुमकिन माना जाता है, तो सबसे पहले जुबां पर मैनपुरी का नाम आता है। यह वही समाजवादी जमीन है जिसे खुद ‘नेताजी’ मुलायम सिंह यादव ने अपने पसीने से सींचा था। साल 1996 से लेकर आज तक लोकसभा चुनावों में इस भूमि ने कभी भी समाजवादियों का दामन नहीं छोड़ा है। हालांकि, वक्त तेजी से बदल रहा है। साल 2022 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस अभेद्य किले की चारदीवारी में ऐसी सेंध लगाई कि मुकाबला दो-दो की बराबरी पर आकर ठहर गया। अब निगाहें साल 2027 के विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं। क्या अखिलेश यादव अपने इस सबसे पुराने और पुश्तैनी गढ़ को बचा पाएंगे या बीजेपी इस बार इस किले को पूरी तरह ढा देगी? आइए जानते हैं क्या कहते हैं यहां के सियासी समीकरण।
इतिहास के पन्नों में मैनपुरी: महर्षि मयन से लेकर 1857 की क्रांति और राजनीतिक कर्मभूमि तक
मैनपुरी उत्तर प्रदेश की एक ऐसी वीरांगना और राजनीतिक सीट है जो अपनी अनूठी ऐतिहासिक पहचान के कारण सीधे जनता के दिलों में बसती है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र भूमि का नाम महान मयन ऋषि के नाम पर पड़ा था, जिन्होंने यहां आश्रम बनाकर घोर तपस्या की थी। मध्यकाल में यह क्षेत्र चौहान वंश के वीर राजपूत राजाओं का प्रमुख गढ़ रहा, जिन्होंने देश की आन-बान और शान के लिए कड़ा संघर्ष किया।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी मैनपुरी का योगदान स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। साल 1857 की क्रांति से लेकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ यहां के क्रांतिकारियों ने जोरदार बिगुल फूंका था। यह तपोभूमि केवल स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं रही, बल्कि आधुनिक भारतीय राजनीतिक इतिहास के केंद्र में भी रही है। इसी धरती को समाजवादी पार्टी के संस्थापक और पूर्व रक्षामंत्री स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक कर्मभूमि होने का ऐतिहासिक गौरव प्राप्त है। नेताजी ने यहां के विकास और जनता के साथ ऐसा भावनात्मक व जमीनी रिश्ता कायम किया कि मैनपुरी समाजवाद का सबसे मजबूत और अभेद्य किला बन गया।
मैनपुरी की चार हॉट विधानसभा सीटें: करहल से लेकर भोगांव तक का सियासी गणित
आज मैनपुरी की चारों विधानसभा सीटें उत्तर प्रदेश की सबसे हॉट और संवेदनशील सीटों में तब्दील हो चुकी हैं। हर सीट का अपना एक अलग मिजाज और चुनावी इतिहास है:
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करहल सीट (सपा का दिल): साल 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां से खुद अखिलेश यादव ने रिकॉर्ड तोड़ मतों से जीत दर्ज की थी। उनके सांसद बनने के बाद हुए उपचुनाव में भी यादव परिवार के तेज प्रताप यादव ने इस गढ़ पर ‘लाल टोपी’ का परचम मजबूती से बुलंद रखा। यहां समाजवादी पार्टी को शिकस्त देना बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
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किशनी सीट (सुरक्षित): परिसीमन के बाद से इस सीट पर लगातार समाजवादी पार्टी का एकछत्र राज रहा है। इंजीनियर बृजेश कठेरिया यहां से लगातार जीत की हैट्रिक लगा चुके हैं।
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मैनपुरी सदर सीट: साल 2022 के चुनाव में यहां बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला, जब बीजेपी के दिग्गज नेता जयवीर सिंह ने सपा के इस पारंपरिक गढ़ में कमल खिलाकर इतिहास रच दिया।
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भोगांव सीट: साल 2017 से ही यह सीट बीजेपी का एक मजबूत स्तंभ बनी हुई है, जहां से रामनरेश अग्निहोत्री लगातार सपा के उम्मीदवारों को शिकस्त देते आ रहे हैं।
यही दो-दो की बराबरी का आंकड़ा साल 2027 की जंग को दोनों प्रमुख दलों के लिए जीवन-मरण का राजनीतिक सवाल बना देता है।
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विकास के दावों के बीच जमीन पर गूंजते किसानों और क्षेत्र के असल मुद्दे
राजनेताओं के बड़े-बड़े दावों और वादों के बीच मैनपुरी की आम जनता के अपने कुछ जमीनी और गंभीर मुद्दे भी हैं। यह पूरा भौगोलिक क्षेत्र बेहतरीन बासमती चावल, आलू की बंपर पैदावार, मशहूर कपूरी तंबाकू और अपनी खास कृषि अर्थव्यवस्था के लिए जाना जाता है।
मगर आज यहां का मेहनतकश किसान गहरे संकट में है। आवारा पशुओं द्वारा फसलों की बड़े पैमाने पर बर्बादी और आलू व धान जैसी मुख्य फसलों का सही और लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) न मिलना यहां का सबसे बड़ा चुनावी और सुलगता मुद्दा बनता हुआ नजर आ रहा है। जनता इन बुनियादी परेशानियों के समाधान के आधार पर ही अपने जनप्रतिनिधियों का आकलन कर रही है।
2027 की जंग: सपा की पीडीए रणनीति बनाम बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग
मैनपुरी के इस महासंग्राम को जीतने और अपनी सियासी साख बचाने के लिए समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों ने ही अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
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समाजवादी पार्टी की रणनीति: सपा के लिए यह चुनाव अपने सबसे पुराने और सबसे सुरक्षित गढ़ को बचाने की सर्वोच्च लड़ाई है। पार्टी अपने पारंपरिक यादव वोट बैंक को पूरी तरह एकजुट रखने के साथ-साथ अध्यक्ष अखिलेश यादव के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले पर मुकम्मल जोर दे रही है। पार्टी सांसद डिंपल यादव और स्थानीय नेता लगातार बूथ स्तर पर कमेटियों को मजबूत करने में जुटे हैं, ताकि दलित और शाक्य मतदाताओं को जोड़कर 2022 की दो-दो की बराबरी को 2027 में चार-शून्य की एकतरफा जीत में बदला जा सके।
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भारतीय जनता पार्टी की रणनीति: दूसरी तरफ, बीजेपी इस किले को नेस्तनाबूद करने के लिए आक्रामक सोशल इंजीनियरिंग और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को अपना मुख्य हथियार बना रही है। बीजेपी का पूरा फोकस गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) जैसे शाक्य और लोधी मतदाताओं के साथ-साथ सवर्ण जातियों को एक मंच पर लाने पर है। योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री जयवीर सिंह और स्थानीय संगठन विकास कार्यों, बेहतर कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के दम पर जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं, ताकि सदर और भोगांव में अपनी जीत बरकरार रखते हुए करहल और किशनी में भी कमल खिलाया जा सके।
जातियों का पेचीदा गणित और आने वाला सियासी भविष्य
मैनपुरी की इस राजनीतिक बिसात पर असली खेल हमेशा से जातियों के सटीक गणित का रहा है। यहां सबसे बड़ी मतदाता ताकत यादव समाज के लोग हैं, जो पारंपरिक रूप से पूरी एकजुटता के साथ समाजवादी पार्टी के पीछे खड़े नजर आते हैं। हालांकि, केवल एक जाति के समर्थन से लखनऊ की सत्ता का रास्ता तय नहीं होता।
इस क्षेत्र में शाक्य, लोधी, ठाकुर, ब्राह्मण और जाटव मतदाता किंगमेकर की भूमिका निभाते हैं। जहां एक ओर बीजेपी गैर-यादव पिछड़ों और सवर्णों को एकजुट करने की जुगत में है, वहीं अखिलेश यादव अपने ‘पीडीए’ फॉर्मूले के दम पर बीजेपी के इस वोट बैंक में गहरी सेंध लगाने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। बहरहाल, राजनीतिक दलों की तैयारियां अपने चरम पर हैं, लेकिन असली परीक्षा 2027 के चुनाव परिणाम के दिन होगी, जब यह तय होगा कि मैनपुरी का यह ऐतिहासिक ताज आखिरकार किस राजनीतिक दल के सिर पर सजता है।

