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भारत की 5 सबसे बड़ी एयरलाइंस क्यों हुई फेल, नंबर 3 का कारण सुनकर आप विश्वास नहीं करेंगे

indian airline crisis: एक ज़माना था जब भारतीय एविएशन सेक्टर में नई-नई एयरलाइंस की एंट्री हुई। लोगों को लगा कि अब उड़ानें भरना और भी सुलभ होगा। कुछ ने शाही सुविधाओं का लालच दिया, तो कुछ ने किफायती टिकटों का सपना दिखाया। पर यह मनमोहक दृश्य जल्द ही बदलने लगा।

बढ़ते कर्ज़ का बोझ, आसमान छूती ईंधन कीमतें और खराब प्रबंधन के फैसलों ने कई बड़ी एयरलाइंस को जमीन पर ला दिया। आज हम जानेंगे ऐसी ही पांच एयरलाइंस की दर्दनाक दास्तान। उनकी कहानी अलग-अलग है, पर सीख एक ही है: हवाई सफर का कारोबार आसान नहीं।

किंगफिशर एयरलाइन: महंगी उड़ान, बुरा अंजाम

नागर विमानन मंत्रालय के अनुसार, किंगफिशर एयरलाइन को 2003 में उड़ान संचालन की अनुमति मिली थी। मगर, कंपनी को लगातार भारी घाटा हो रहा था। इसकी बड़ी वजहें थीं: ईंधन की बढ़ती कीमत, बेहिसाब खर्च और टिकटों पर कम कमाई। जल्द ही, एयरलाइन पर हजारों करोड़ रुपये का कर्ज चढ़ गया।

एयर डिकेन को खरीदने और अंतर्राष्ट्रीय रूट्स पर तेज़ी से फ़ैलाव करने के बावजूद, कंपनी फायदा नहीं कमा पाई। हालात इतने बिगड़ गए कि कंपनी कर्मचारियों को वेतन और बैंकों का पैसा समय पर नहीं चुका पाई। उड़ानें अचानक रद्द होने लगीं। आखिरकार सुरक्षा और वित्तीय कारणों का हवाला देते हुए DGCA ने 20 अक्टूबर 2012 को इसका एयर परमिट रद्द कर दिया।

जेट एयरवेज: शानदार शुरुआत, फिर ठहराव

जनवरी 1995 में जेट एयरवेज को शेड्यूल्ड एयरलाइन का दर्जा मिला, यानी अब यह नियमित यात्री उड़ानें चला सकती थी। 2000 के दशक में जेट एयरवेज ने तेज़ी से तरक्की की थी। मगर नागरिक उड्डयन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2018 में कंपनी को बड़ा नुकसान हुआ।

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लगातार चार तिमाहियों तक घाटे में रहने से इसकी नकदी खत्म होने लगी। एयरलाइन को चलाना मुश्किल (Indian aviation crisis) हो गया। सरकार के अनुसार, RBI के ‘प्रोजेक्ट शक्त’ के तहत एक समाधान योजना (Resolution Plan) बनाई गई। मगर, जेट एयरवेज के साझेदार एतिहाद और भारतीय बैंकों के बीच सहमति नहीं बन पाई। 10 अप्रैल 2019 को कंपनी ने अपनी अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें रोक दीं और 17 अप्रैल 2019 को जेट एयरवेज ने अपनी सभी सेवाएं बंद कर दीं।

गो फर्स्ट: इंजन का झमेला, दिवालियापन का फैसला

नवंबर 2005 में ‘गो एयर’ की शुरुआत एक किफायती एयरलाइन के तौर पर हुई थी। मार्च 2021 में इसका नाम बदलकर ‘गो फर्स्ट’ कर दिया गया। मई 2023 में कंपनी ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में दिवालियापन कानून के तहत आवेदन दायर किया। कंपनी ने कहा कि वह आर्थिक संकट में है और दिवालियापन की प्रक्रिया में जाना चाहती है।

कंपनी का दावा था कि वह 2009 से 2018 तक लगातार फायदे में थी, मगर 2022 से भुगतान में दिक्कतें शुरू हो गईं। इसके साथ ही, इंजन की समस्या इतनी बढ़ गई कि उसके कई विमान उड़ान नहीं भर सके। एयरलाइन ने इंजन बनाने वाली प्रैट और विटनी कंपनी पर इंजन मरम्मत या नए इंजन नहीं देने का आरोप लगाया। अगस्त 2024 में, गो फर्स्ट के लिए बनाई गई बचाव योजना को बैंकों ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद 20 जनवरी 2025 को NCLT ने गो फर्स्ट के लिक्विडेशन (संपत्ति बेचकर कर्ज चुकाना) का आदेश दिया। 17 साल से ज़्यादा समय तक उड़ान भरने वाली गो फर्स्ट की कहानी समाप्त हो गई।

एयर डेक्कन: कम दाम, कम किस्मत

एयर डेक्कन’ चलाने वाली कंपनी का नाम ‘डेक्कन एविएशन लिमिटेड’ था। अगस्त 2003 में इसने अपनी उड़ानें शुरू कीं। सेंटर फॉर एविएशन के अनुसार, 2007 में किंगफिशर एयरलाइन ने इसमें 26 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी और इसका नाम बदलकर ‘सिंपलीफाई डेक्कन’ कर दिया।

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2008 में इसे फिर से रीब्रांड किया गया और किंगफिशर रेड में मिला दिया गया। एक लंबे अंतराल के बाद, एयर डेक्कन ने 22 दिसंबर 2017 को सरकार की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना ‘उड़ान’ के तहत दोबारा उड़ानें शुरू कीं। मगर, अप्रैल 2020 में कोविड महामारी के कारण कंपनी के CEO अरुण कुमार सिंह ने एयरलाइन को अनिश्चित काल के लिए बंद करने की घोषणा की।

पैरामाउंट एयरवेज: लक्जरी का सपना जो टूटा

इस कंपनी ने अक्टूबर 2005 में उड़ान सेवाएं शुरू की थीं। इसका लक्ष्य यात्रियों को किफायती दरों पर बिजनेस क्लास जैसी सेवाएं देना था। कंपनी ने अपने आधुनिक विमानों को पट्टे (Lease) पर लिया हुआ था। मगर लीज के पैसे चुकाने में अनियमितता और विवादों के कारण एयरलाइन और लीज देने वाली कंपनियों के बीच कानूनी लड़ाई शुरू हो गई।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, कंपनी पर कई बैंकों के समूह का 400 करोड़ रुपये से ज़्यादा बकाया था। इन कानूनी पचड़ों की वजह से लीज कंपनियों ने उसके विमान जब्त करवा लिए। इससे पूरी फ्लीट जमीन पर आ गई और 2010 के दौरान कंपनी की सभी उड़ानें बंद हो गईं।

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