Karur Stampede Update: हर भीड़ का अंत मौत क्यों, किसकी चूक बनी 40 मौतों की वजह
Karur Stampede Update: तमिलनाडु के Karur में राजनीतिक रैली में भगदड़ मचने से चालीस नागरिकों की मौत होना वाकई बेहद दुखद है। इस हृदय विदारक घटना पर सियासत शुरू हो गई है। देश में भगदड़ का मतलब मौत का तांडव मचना है।
बेकाबू भीड़ को नियंत्रित ( Karur Crowd Control Failure) करना कतई संभव नहीं है। किसी राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक कार्यक्रम में भगदड़ मचने पर आमतौर पर उन नागरिकों को जान से हाथ धोना पड़ता है, जो वहां अपने चहेते नेता, अभिनेता या धर्मगुरु को करीब से देखने की चाहत रखते हैं, मगर जरा सी गलती के कारण पलभर में सब कुछ बदल जाता है।
थलपति विजय की मुश्किलें बढ़ीं
प्रभावित परिवारों को जिंदगी भर का असहनीय दर्द मिलता है। आर्थिक सहायता सिर्फ राहत प्रदान करती है, मगर अपनों को खोने का दर्द फिर भी बरकरार रहता है। अभिनेता से नेता बने विजय तमिल सिनेमा में जाना-पहचाना नाम है। फैंस उन्हें प्यार से थलपति भी बुलाते हैं। हादसे पर दुख जाहिर कर विजय ने सभी मृतकों के आश्रितों को बीस-बीस लाख रुपए की आर्थिक मदद का ऐलान किया है। वही तमिलनाडु की एमके स्टालिन सरकार दस-दस लाख रुपए की मदद उपलब्ध कराएगी। Karur Stampede से अभिनेता थलपति विजय की मुश्किलें बढ़ना भी तय हैं।
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Karur Accident की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, उन्हें जांच एजेंसी के सवालों का सामना करना पड़ सकता है। राजनीति में सक्रिय होने से पहले वह विवाद और मुसीबत में घिर गए हैं। भारत में सेलिब्रिटी को देखने के लिए अक्सर जबरदस्त भीड़ जुट जाती है। कोई सेलिब्रिटी किसी निजी कार्यक्रम में पहुंचे अथवा सार्वजनिक समारोह में, खबर मिलने पर फैंस वहां पहुंचने में देर नहीं करते। भीड़ जुटने पर अव्यवस्था फैलना तय है।
खासकर पसंदीदा नेता या अभिनेता की एक झलक पाने को समर्थक कोई नियम कानून नहीं मानते। ऐसे में जान का रिस्क बढ़ जाता है। देश में पिछले कुछ साल के भीतर भगदड़ की घटनाओं में वृद्धि देखने को मिली है। इसके बावजूद भीड़ प्रबंधन की नीतियां पूरी तरह से नाकाम हैं। प्रत्येक घटना के बाद जांच प्रक्रिया आरंभ की जाती है। जैसे-जैसे दिन गुजरते लगते हैं, वैसे-वैसे मामला ठंडे बस्ते में जाने लगता है। बाद में कोई नई घटना होने पर पुराने मामलों को याद किया जाता है। कुछ दिन पहले असम की सड़कों पर नागरिकों का हुजूम देखने को मिला था। लाखों की भीड़ अपने पसंदीदा गायक की असमय मौत से व्यथित थी। दिवंगत गायक को श्रद्धांजलि देने के लिए मानो पूरा असम सड़कों पर निकल पड़ा था।
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हालांकि असम में जिस तरह का अनुशासन नागरिकों ने बनाए रखा, वैसा आमतौर पर देखने को नहीं मिलता। भगदड़ (rout) की कोई बड़ी घटना पर दो बातें जरूरी उठती हैं। पहली भीड़ प्रबंधन में नाकामी और दूसरी नागरिकों में जागरूकता की कमी। आखिर मौत का यह सिलसिला रुकता क्यों नहीं है? इसका वाजिब जवाब किसी के पास नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भगदड़ में नागरिकों की जान जाने का क्रम आगे भी जारी रहेगा? क्या भव्य आयोजन से पहले आयोजकों की कोई जिम्मेदारी-जवाबदेही तय नहीं की जाएगी?
आरोप-प्रत्यारोप की सियासत से अब तक न कुछ बदल पाया है, ना आगे कुछ बदलने की उम्मीद है। यानी सरकार के भरोसे बैठे रहना समझदारी नहीं है। जीवन बड़ा अनमोल है। प्रत्येक नागरिक को अपने जीवन की सुरक्षा के लिए खुद सतर्क रहना पड़ेगा। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने आमजन की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संगठित नीति बनाने की जरूरत पर जोर दिया है। फिलहाल Karur Stampede की ताजा Update पर पूरे देश की नजर बनी हुई है।

