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President rule in West Bengal: क्या गिरने वाली है ममता बनर्जी की सरकार

President rule in West Bengal: बंगाल की सियासत एक मर्तबा फिर गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के हालिया बयान ने सियासी हलकों में हलचल मचा दी है। मगर इस बार सवाल है कि इस बयान का असली असर किस पर पड़ेगा जनता पर, प्रशासन पर या सिर्फ सियासी दुनिया तक सीमित रहेगा।

दिलीप घोष के दावों से हलचल तेज (Bengal politics 2025)

घोष ने हाल ही में यह कहकर चौंका दिया कि अप्रैल से पहले बंगाल में राष्ट्रपति शासन (President rule) लागू हो सकता है। साथ ही, उन्होंने चीफ मिनिस्टर ममता बनर्जी को उनके कालीघाट स्थित निवास लौटने की बात कही। यह सिर्फ एक राजनीतिक तंज था या कोई संकेत? इस पर बहस तेज हो गई है।

मगर बात यहीं नहीं रुकी। घोष ने SIR (Special Summary Revision) प्रक्रिया को लेकर भी अजीबोगरीब दावा किया कि इससे एक करोड़ से ज्यादा वोटर्स के नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाएंगे, जिससे तृणमूल कांग्रेस की हार तय हो जाएगी।

जनता की नजर से देखें तो…

इन सियासी बयानों का असर सीधा आम लोगों पर पड़ता है। जब करोड़ों वोट काटे ( West Bengal voter list issue) जाने की बात की जाती है, तो सवाल उठता है कि क्या जनता की भागीदारी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया सुरक्षित है? बिहार में पहले से ही मतदाता लिस्ट में नाम कटने को लेकर सियासी दल सवाल उठा रहे हैं। अब बंगाल में भी यही आशंका जताई जा रही है।

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क्या राष्ट्रपति शासन इतना आसान है?

संवैधानिक जानकारों का मानना है कि किसी भी राज्य में President rule लागू करना सिर्फ एक राजनीतिक फैसला नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि अनुच्छेद 356 का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए नहीं किया जा सकता। खासकर 1994 के एस.आर. बोम्मई मामले में कोर्ट ने इसे लेकर कड़ा रुख अपनाया था।

इस लिहाज से दिलीप घोष की भविष्यवाणी कानूनी रूप से बेहद मुश्किल दिखाई देती है।

SIR प्रक्रिया पर भ्रम फैलाने की कोशिश? (Bengal political crisis)

घोष के अनुसार, TMC SIR प्रक्रिया से घबराई हुई है। मगर हकीकत यह है कि बंगाल में चुनाव आयोग की निगरानी काफी मजबूत होती है। फर्जी वोट काटने या चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी की संभावना बेहद कम है। फिर भी, ऐसे बयान आम जनता के बीच डर और भ्रम पैदा कर सकते हैं।

धार्मिक कार्यक्रमों पर भी टिप्पणी

दिलीप घोष ने दुर्गा पूजा पंडालों के उद्घाटन को लेकर भी चीफ मिनिस्टर ममता बनर्जी पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि चीफ मिनिस्टर अपने हिसाब से पंचांग तय करती हैं और त्योहारों पर मनमानी छुट्टियां देती हैं। हालांकि यह बयान भी सियासी रंग लिए हुए लगता है और सीधे तौर पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाला हो सकता है। जिससे West Bengal में President rule तय माना जा रहा है।
ममता का किला अब भी मजबूत

राज्य की जनता ने हमेशा संकट के वक्त में अपने नेताओं को समर्थन दिया है। वर्तमान सियासी घटनाक्रम के बीच ममता बनर्जी की लोकप्रियता में गिरावट के संकेत नहीं मिल रहे हैं। घोष के बयानों से तात्कालिक राजनीतिक माहौल जरूर गर्म हुआ है, मगर सत्ता परिवर्तन के आसार फिलहाल नजर नहीं आते।

 

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