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UP MLC Election: लखनऊ स्नातक सीट पर संगठन, अनुभव और आंदोलन में त्रिकोणीय जंग

23 अक्टूबर को 16 प्रत्याशियों की किस्मत तय करेंगे स्नातक मतदाता, 27 को खुलेगा जीत का पिटारा

Eela India News

लखनऊ। विधान परिषद की लखनऊ खंड स्नातक सीट पर इस बार चुनावी मुकाबला महज राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि संगठन, अनुभव और आंदोलन की ताकत के बीच भी है। भाजपा ने मौजूदा एमएलसी अवनीश कुमार सिंह पर दोबारा दांव लगाया है तो सपा ने पूर्व एमएलसी कांति सिंह को मैदान में उतारकर मुकाबले को धार दी है। वहीं, पुरानी पेंशन बहाली के आंदोलन से पहचान बनाने वाले विजय कुमार बंधु ने निर्दलीय ताल ठोककर दोनों दलों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। चुनाव मैदान में कुल 16 प्रत्याशी हैं, लेकिन सियासी निगाहें इन तीन प्रमुख चेहरों पर टिकी हैं।

भाजपा के लिए यह सीट बरकरार रखने की चुनौती है तो सपा पुराने प्रदर्शन को जीत में बदलने की कोशिश में है। दूसरी ओर विजय बंधु कर्मचारी-शिक्षक आंदोलन से जुड़े जनाधार को वोटों में तब्दील करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। ऐसे में 23 अक्टूबर को होने वाला मतदान तय करेगा कि स्नातक मतदाता दल के साथ जाते हैं या मुद्दों और आंदोलन के नाम पर नया समीकरण बनाते हैं।

1.71 लाख मतदाताओं पर भाजपा का विशेष फोकस

भाजपा प्रत्याशी अवनीश कुमार सिंह के पक्ष में पार्टी ने पूरी संगठनात्मक ताकत झोंक दी है। सांसद से लेकर बूथ स्तर तक पदाधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई है। भाजपा का दावा है कि उसकी टीम की ओर से तैयार कराए गए करीब 1.71 लाख स्नातक मतदाताओं पर विशेष फोकस है। मतदाताओं से व्यक्तिगत संपर्क के साथ उन्हें मतदान केंद्र तक पहुंचाने की रणनीति बनाई गई है। पार्टी को भरोसा है कि मजबूत बूथ प्रबंधन और संगठन के सहारे अवनीश सिंह दोबारा जीत दर्ज करेंगे।

पुराने जनाधार के साथ सपा की ताकत बनी कांति का सहारा

सपा प्रत्याशी कांति सिंह के सामने अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने के साथ उसे जीत में बदलने की चुनौती है। वर्ष 2014 से 2020 तक इस सीट से एमएलसी रह चुकीं कांति सिंह ने पिछला चुनाव निर्दलीय लड़ा था और मुख्य मुकाबले में रही थीं। सपा की कोशिश परंपरागत समर्थकों के साथ युवा और असंतुष्ट स्नातक मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद करने की है।

पुरानी पेंशन के मुद्दे पर विजय बंधु ने बढ़ाई हलचल

भाजपा और सपा के बीच निर्दलीय प्रत्याशी विजय कुमार बंधु की दावेदारी ने चुनाव को दिलचस्प बना दिया है। पुरानी पेंशन बहाली के आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे बंधु ने पेंशन, रोजगार, निजीकरण और शिक्षक हितों को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया है। नामांकन के दौरान विभिन्न कर्मचारी, शिक्षक और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों की मौजूदगी ने भी उनकी दावेदारी को चर्चा में ला दिया। हालांकि आंदोलन के समर्थन को मतदान केंद्र तक पहुंचाकर वोटों में बदलना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।

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कर्मचारी-शिक्षक मतदाता बिगाड़ सकते हैं दलों का गणित

इस चुनाव में कर्मचारी और शिक्षक परिवारों से जुड़े स्नातक मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जा रही है। विजय बंधु यदि पुरानी पेंशन आंदोलन से जुड़े समर्थकों को एकजुट करने में सफल हुए तो भाजपा और सपा के चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। खासकर उन मतदाताओं पर उनकी नजर है, जो दलगत निष्ठा के बजाय पेंशन, रोजगार और कर्मचारी हितों को प्राथमिकता देते हैं। वहीं, दोनों प्रमुख दल भी इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं।

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