इन 4 मजबूरियों को चलते बीजेपी ने नीतीश को बनाया बिहार का सीएम
बिहार की राजनीति ने एक बार फिर सबको चौंका दिया। आखिरकार लंबी खींचतान के बाद नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) चाहकर भी अपना मुख्यमंत्री क्यों नहीं बना पाई और उन्हें किस मजबूरी में नीतीश का समर्थन करना पड़ा? आइए इस पूरे घटनाक्रम और इसकी वजहों को समझते हैं।
मुख्यमंत्री पद पर इतना मंथन क्यों?
चुनाव के दौरान बीजेपी के बड़े नेताओं के बयानों को याद करें। जब चुनाव चल रहा था तब अमित शाह ने कहा था कि मुख्यमंत्री कौन होगा यह हम चुनाव नतीजों के बाद बैठकर तय करेंगे। इस बयान के बाद लगभग सभी नेता यही दोहराने लगे। सवाल उठता है कि अगर नीतीश कुमार का नाम तय था तो उनका नाम खुलकर क्यों नहीं लिया गया?
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नतीजे आए 14 तारीख को मगर मुख्यमंत्री का फैसला 19 तारीख तक खिंच गया। पटना से दिल्ली तक देर रात तक बैठकों का दौर चला। इस दौरान संजय झा और ललन सिंह जैसे करीबी नेता लगातार दिल्ली में डेरा डाले रहे। सूत्रों की मानें तो यह देरी और गहन मंथन बताता है कि बीजेपी के मन में कुछ और ही योजना थी। मगर नीतीश कुमार को भी इस संभावित प्लान की भनक लग गई।
नीतीश का ‘ब्रह्मास्त्र’ और बीजेपी की मजबूरी
इस देरी के बीच कुछ मीडिया चैनलों पर ऐसे सर्वे चलने लगे कि अगर बीजेपी अपना मुख्यमंत्री बनाती है तो सबसे बेहतर नाम कौन हो सकता है? यह सब देखकर नीतीश कुमार ने अपना राजनीतिक ‘ब्रह्मास्त्र’ चला दिया।
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चुनाव के पहले चरण में ही एक बात सामने आ गई थी। जहाँ बीजेपी ने नीतीश के नाम से थोड़ी दूरी बनाई, वहाँ वोटों पर इसका नकारात्मक असर पड़ने लगा। आपको समझना होगा कि नीतीश कुमार सिर्फ एक नेता नहीं हैं वे बिहार की राजनीति का सेंटीमेंट हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका मजबूत महिला वोट बैंक है। नीतीश कुमार ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि राज्य की सियासत की चाबी उन्हीं के पास है।
नीतीश के सामने कोई दमदार चेहरा नहीं
बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बिहार में उनके पास आज भी नीतीश कुमार के कद का कोई नेता नहीं है। सम्राट चौधरी, विजय सिन्हा, नित्यानंद राय, गिरिराज सिंह जैसे नेताओं की एक लंबी फेहरिस्त है मगर नीतीश के मुकाबले का कोई चेहरा बीजेपी के पास नहीं है। यह बीजेपी की पुरानी समस्या रही है कि वह बिहार में कोई बड़ा और सर्वमान्य चेहरा नहीं खड़ा कर पाई। ऐसे में नीतीश को हटाना राजनीतिक रूप से एक बड़ा जोखिम हो सकता था।
ईबीसी वोट बैंक का डर
नीतीश कुमार के पास आज भी करीब 15 प्रतिशत ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) वोटों का मजबूत आधार है। बीजेपी यह बात अच्छी तरह जानती थी कि अगर वह नीतीश को किनारे करती है तो यह वोट बैंक बीजेपी के खिलाफ जा सकता है। नीतीश कुमार को हटाना बीजेपी के लिए भविष्य में बड़े नुकसान का कारण बन सकता था।
दूसरा डर यह था कि नीतीश को हटाने पर वह तुरंत महागठबंधन के पाले में जाकर सरकार बनाने की कोशिश करते। इससे बिहार में एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती जो बीजेपी बिल्कुल नहीं चाहती थी।
केंद्र की राजनीति का प्रेशर
सबसे निर्णायक और महत्वपूर्ण कारण जिसने बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने कदम पीछे खींचने पर मजबूर किया वह था केंद्र सरकार का समीकरण।
आज की तारीख में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार सहयोगियों के सहारे चल रही है। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू और बिहार में नीतीश कुमार सरकार के लिए बहुत ज़रूरी हैं। ऐसे में अगर नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाया जाता तो यह सीधे तौर पर दिल्ली की सरकार को भी अस्थिर कर सकता था। केंद्र में सरकार बचाए रखने के लिए भी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखना बीजेपी की राजनीतिक मजबूरी बन गई।
बीजेपी की मंशा बेशक बिहार में स्थायी नियंत्रण हासिल करने की थी कि अब वह सिर्फ सहयोगी नहीं बल्कि बराबरी के साझीदार के तौर पर काम करेगी। मगर इतनी मेहनत और सीटें जीतने के बावजूद बीजेपी अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई।
यह घटनाक्रम बताता है कि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की पकड़ आज भी बहुत मजबूत है। उन्होंने दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। यह भारतीय राजनीति में एक तरह का आश्चर्य ही है। भले ही बीजेपी के बड़े नेता विजय सिन्हा ने अपना मुख्यमंत्री बनाने का सपना देखा हो मगर फिलहाल वह सपना अधूरा ही रह गया है। बीजेपी को अब भी बिहार में एक ऐसे नेता की तलाश है जो नीतीश कुमार के सामने खड़ा हो सके।


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