दिल्ली-बिहार में मौत का तांडव: होटल बना आग का गोला, 2 दिन में 30+ लाशें
दिल्ली के बाद बिहार…। देश में भीषण अग्निकांड का सिलसिला न रुकना चिंताजनक है। मालवीय नगर के बाद मुजफ्फरपुर की घटना ने हर किसी के दिल को दहला दिया है। धधकती आग और अपनों को खोकर रोते-बिलखते परिजनों की तस्वीरें व्याकुल कर देती हैं। दिल्ली में बहुमंजिला होटल तो बिहार में प्राइवेट हॉस्पिटल को आग का गोला बनते देर नहीं लगी। ऐसे में आग से बचाव के सभी प्रयास व संसाधन नाकाफी साबित हुए।
सिस्टम को कोसने को मजबूर गमजदा परिवार
लापरवाही से धधकी आग की लपटों ने दो दिन के भीतर तीस से अधिक नागरिकों की जिंदगी लील ली है। पुरानी कहावत है, ‘मार पीछे पुकार’। हादसों की भेंट जो चढ़ गए, वह अब लौटकर नहीं आएंगे। गमजदा परिवारों के पास सिस्टम को कोसने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं है। सिस्टम को कोसते रहिए, सुधार होना मुमकिन नहीं है। होटल मालिक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।
हॉस्पिटल संचालक पर भी कानूनी कार्रवाई होना तय है, मगर जिन विभागों और अधिकारियों पर इस प्रकार के हादसों को रोकने की जिम्मेदारी है, उन्हें कब जवाबदेह ठहराया जाएगा। लापरवाह सरकारी कारिंदों पर भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। दिल्ली और बिहार की घटनाएं न पहली हैं, ना नई हैं। पूर्व में इससे खतरनाक हादसे भी होते रहे हैं। इसके बावजूद व्यवस्था का न सुधरना दुर्भाग्यपूर्ण है।
स्वीकृति से अधिक निर्माण
होटल में 5 की बजाए 21 कमरे कैसे बन गए, स्वीकृति से अधिक निर्माण पर संबंधित विभाग का ध्यान कभी क्यों नहीं गया, इसके लिए दोषी अधिकारियों को भी न्याय के कटघरे में लाने की आवश्यकता है।
आमतौर पर कोई मध्यम वर्गीय परिवार यदि जमीन खरीदकर भवन निर्माण भी शुरू करता है तो क्षेत्रीय सरकारी इंजीनियर दल-बल के साथ मौके पर जाकर नाप-जोख शुरू कर निर्माण की स्वीकृति के बारे में छानबीन करने लगते हैं, मगर देश की राजधानी में खुलेआम कमर्शियल गतिविधि में अनधिकृत निर्माण होने पर संबंधित विभाग मानो आंखें मूंद लेता है।
दिल्ली की घटना ने एक बार फिर होटल, गेस्ट हाउस और रेस्तरां संचालन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनहानि की प्रत्येक घटना के बाद गहन जांच और दोषियों को सख्त सजा देने की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, मगर अंतत: होता कुछ नहीं है। इस बार भी कुछ न हो तो हैरानी नहीं, क्योंकि औसत शासक-प्रशासक गंभीर हादसों से भी सबक न लेने के आदी हो चुके हैं। स्थानीय निकायों के वे अधिकारी-कर्मचारी कभी कठोर दंड का पात्र नहीं बनते, जो अवैध निर्माण और सुरक्षा उपायों की अनदेखी के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार होते हैं।
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नगर निकायों के करप्शन के कारण होने वाले अवैध निर्माण के कारण देश भर में आवासीय क्षेत्र व्यावसायिक गतिविधियों के केंद्र बनते जा रहे हैं। समय-समय पर सरकारें बदल जाती हैं, नगर निकायों के अधिकारी भी बदल जाते हैं, मगर यदि कुछ नहीं बदलता तो अवैध निर्माण और सुरक्षा उपायों की अनदेखी का सिलसिला। यह जानलेवा और शर्मनाक सिलसिला नागरिकों की की जान लेने के अलावा देश की बदनामी कराने के साथ विकसित भारत की अपेक्षाओं पर पानी भी फेर रहा है।
बार-बार पहले जैसे कारणों से हादसे होना नाकारापन और नियामकीय बेशर्मी के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इस घटना से चंद रोज पहले दिल्ली में एक तीन मंजिला आवासीय इमारत के जमींदोज होने की भयावह वीडियो सामने आई थी। संबंधित इमारत का गलत तरीके से विस्तार किया जा रहा था। दिल्ली और बिहार में भाजपा की सरकारें हैं। अलबत्ता विपक्ष का भाजपा सरकारों पर हमलावर होना स्वाभाविक बात है।

