अपना सपना मनी.. मनी, एक-एक सांसद को मिला 15 करोड़ का एडवांस
‘अपना सपना मनी.. मनी!’, ‘हनी प्लस मनी…’। महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की सियासत में आजकल बागियों पर भड़ास निकालने के लिए ‘हनी और मनी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल हो रहा है। बागियों पर तीखे तंज कसकर कुछ लीडर अपना दिल हल्का कर रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बाद शिवसेना (यूबीटी) में भगदड़ मच गई है। चर्चा है कि शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री उद्धब ठाकरे का साथ छोड़कर 6-7 सांसद नए घर की तलाश में निकल पड़े हैं। इन सांसदों के एकनाथ शिंदे की शिवसेना में जाने या नया गुट बनाने की चर्चाओं ने जोर पकड़ रखा है। उद्धव की पार्टी के कुल 9 सांसद हैं। जिनमें आधे से ज्यादा बगावत पर उतर आए हैं।
भरसक कोशिश के बावजूद इन सांसदों की घर वापसी के संकेत नजर नहीं आ रहे हैं। इसके पहले पश्चिम बंगाल के 20 सांसदों ने टीएमसी को टाटा, बाय-बाय कर दिया था। इससे पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बड़ा झटका लगा था। टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) ने इस तोड़फोड़ के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया है। दोनों पार्टियों का आरोप है कि साजिश के तहत सांसदों की खरीद-फरोख्त की गई है। हालांकि इस बावत कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध कराने में टीएमसी और उद्धव की पार्टी नाकाम हैं।
हर सांसद को 15 करोड़ एडवांस
दोनों दल सोशल मीडिया के जरिए बागी सांसदों पर जमकर निशाना साध रहे हैं। शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने सोशल मीडिया पर अपनी पहली पोस्ट में कहा कि “अपना सपना मनी..मनी! महाराष्ट्र के सांसदों को खरीदने के लिए हर एक सांसद को 15 करोड़ रुपये का एडवांस दिया जा रहा है। यह जानकारी चौंकाने वाली और घृणित है!” राउत की इस पोस्ट पर टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि, “सिर्फ 15 करोड़? इतनी सस्ती कीमत पर क्यों जा रहे हैं? हमारी पार्टी के बागी नेताओं को 4 करोड़ रुपये मिले थे और अगले 36 माह के कार्यकाल में प्रतिमाह एक करोड़ रुपये मिलने वाले हैं। हनी प्लस मनी।”
इस बीच सांसद संजय राउत द्वारा बागी सांसदों को खुलेआम गालियां दिए जाने पर भी विवाद पैदा हो गया है। विवाद बढ़ने के बाद भी राउत ने अपनी गलती मानने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि महाराष्ट्र में इसी प्रकार बात की जाती है। शिवसेना (यूबीटी) और टीएमसी की हालत एक जैसी हो गई है। किसी समय टीएमसी पर ममता बनर्जी की और शिवसेना पर उद्धब ठाकरे की मजबूत पकड़ थी, मगर वर्तमान में दोनों नेता लाचार दिखाई पड़ रहे हैं। इसके अलावा पिछले कुछ दिनों से ‘ऑपरेशन टाइगर’ शब्द मीडिया में चर्चा का विषय है।
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राजनीति में सब कुछ संभव
वैसे राजनीति में सब कुछ संभव होता है। जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की होती, वह घटनाक्रम भी अचानक घट जाता है। महाराष्ट्र में एक समय शिवसेना की हिंदूवादी पार्टी के तौर पर पहचान थी। इसके संस्थापक बाला साहेब ठाकरे ने लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने के बावजूद कभी किसी सरकार में पद की लालसा नहीं दिखाई थी। वह बेबाक बोलने के लिए भी जाने जाते थे। बाला साहेब के निधन के बाद शिवसेना की कमान उनके बेटे उद्धब ठाकरे के हाथ में आई। भाजपा से रिश्ते खराब होने पर ठाकरे ने विपक्षी दलों से हाथ मिला था। विपक्ष की मदद से वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री तक बन गए थे। इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सियासी जमीन बेहद मजबूत थी, मगर एक झटके में जमीन पैरों तले से खिसक गई।

