क्या रूस, चीन और ईरान से खौफ खा रहा है अमेरिका, इतिहास का सबसे बड़ा हथियार सौदा देख दुनिया हैरान
आज की दुनिया में तनाव, अविश्वास और युद्ध की विभीषिका लगातार बढ़ती जा रही है। छोटे हों या बड़े, लगभग हर देश अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए हथियारों का जखीरा जुटाने में लगा हुआ है। भारत को जहां चीन-पाकिस्तान के गठजोड़ से खतरा महसूस होता है, वहीं अमेरिका को रूस, चीन और ईरान की नजदीकी चिंता में डाल रही है।
इसी वैश्विक अस्थिरता और महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई के बीच, दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अमेरिका ने रक्षा इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा हथियार ऑर्डर जारी कर सभी को चौंका दिया है।
58 अरब डॉलर का ऐतिहासिक हथियार सौदा
बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच अमेरिका ने लॉकहीड मार्टिन (Lockheed) के साथ मिलकर 58 अरब डॉलर (लगभग 4.8 लाख करोड़ रुपये) का रिकॉर्ड तोड़ हथियार समझौता किया है। इतिहास में कभी भी किसी देश ने हथियारों की इतनी बड़ी खरीद का सौदा एक साथ नहीं किया है। इस भारी-भरकम डील के तहत अमेरिका अपनी सेना के लिए अत्याधुनिक पैट्रियट मिसाइलें (Patriot Missiles) और घातक इंटरसेप्टर खरीदेगा। इस मेगा डील से अमेरिकी खजाने पर भारी असर पड़ना तय है, लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए अमेरिका के लिए यह मजबूरी भी बन चुका है।
क्यों अचानक खाली हो गई अमेरिका की तिजोरी?
सवाल यह उठता है कि दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत को अचानक इतने बड़े पैमाने पर हथियार खरीदने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके पीछे कई बड़े कारण छिपे हैं:
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ईरान और मध्य पूर्व का तनाव: अमेरिका और उसके सहयोगी लंबे समय से ईरान पर दबाव बनाने के लिए सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं। हालिया संघर्षों और ईरान के साथ टकराव के दौरान अमेरिका को भारी मात्रा में मिसाइल इंटरसेप्टर का इस्तेमाल करना पड़ा है।
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यूक्रेन और इजरायल को लगातार सप्लाई: पिछले कुछ सालों से रूस-यूक्रेन युद्ध और इजरायल-हमास संघर्ष में अमेरिका ने अपने सैन्य भंडारों से भारी मात्रा में हथियार और मिसाइलें यूक्रेन व इजरायल को भेजी हैं।
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चीन से संभावित टक्कर का डर: पेंटागन को इस बात का सबसे बड़ा डर सता रहा है कि यदि भविष्य में सुपरपॉवर बनने की होड़ में चीन के साथ सीधा टकराव होता है, तो कहीं अमेरिकी सेना के पास एडवांस मिसाइलें और हथियार कम न पड़ जाएं।
पेंटागन की सोची-समझी रणनीति और डिफेंस सेक्टर में बूम
यह मेगा डील पेंटागन (Pentagon) की एक सोची-समझी बड़ी रणनीति का अहम हिस्सा है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के खाली हो चुके मिसाइल स्टॉक को तुरंत भरना है। इस भारी-भरकम निवेश से अमेरिका के रक्षा निर्माताओं (Defense Manufacturers) को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने, सप्लाई चेन को मजबूत करने और भविष्य की नई तकनीकों में बिना किसी झिझक के भारी निवेश करने का मौका मिलेगा।
आज वैश्विक स्तर पर सैन्य और परमाणु हथियारों पर होने वाला खर्च रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है, जिसमें अमेरिका, चीन और रूस सबसे आगे हैं। दुनिया की टॉप 100 हथियार बनाने वाली कंपनियों का मुनाफा भी आसमान छू रहा है।
हथियारों की होड़ और मानवता पर मंडराता संकट
एक तरफ जहां देश हथियारों के अंबार लगा रहे हैं, वहीं इस अंधी दौड़ का सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता और वैश्विक विकास को भुगतना पड़ रहा है। आज भी दुनिया के कई देशों में लाखों लोग गरीबी, भुखमरी, बीमारी और अशिक्षा के दलदल में फंसकर जीने को मजबूर हैं। लेकिन सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी विकास पर पैसा खर्च करने के बजाय अपने सैन्य बजट को लगातार बढ़ा रही हैं।
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विशेषज्ञों का मानना है कि यह मानवता के साथ एक प्रकार का अन्याय है। यदि दुनिया के कुल सैन्य बजट का एक छोटा सा हिस्सा भी मानव विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य पर लगा दिया जाए, तो इस धरती से गरीबी और भूख को काफी हद तक मिटाया जा सकता है। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि आज की वैश्विक राजनीति अभी भी हथियारों के बल पर शक्ति संतुलन बनाने के इर्द-गिर्द ही घूम रही है।

