40% ओबीसी और 28% मुस्लिम वोटर: जानिए पश्चिमी यूपी की 136 सीटों का पूरा जातीय और सियासी गणित
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर कोई ऐसा इलाका है जो सरकार बनाने और बिगाड़ने की पूरी ताकत रखता है, तो वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश है। राज्य की कुल 136 विधानसभा सीटों वाला यह महत्वपूर्ण क्षेत्र हर चुनाव में राजनीतिक दलों का पूरा गणित बदल देता है।
मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, सहारनपुर, बिजनौर, बुलंदशहर, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, अलीगढ़, मुरादाबाद और रामपुर जैसे जिलों में फैले इस इलाके ने हमेशा साबित किया है कि लखनऊ की कुर्सी का रास्ता यहीं से होकर गुजरता है। आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सभी प्रमुख दल अपनी तैयारियों में जुट गए हैं और जनता के बीच सियासी पारा चढ़ने लगा है।
पश्चिमी यूपी का चुनावी महत्व और सियासी इतिहास
चुनावी लिहाज से पश्चिमी यूपी हमेशा से बेहद संवेदनशील और निर्णायक रहा है। साल 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों के साथ-साथ लोकसभा चुनावों में भी इस क्षेत्र ने राजनीतिक दलों की दिशा और रणनीति तय करने में अहम भूमिका निभाई है। यही वजह है कि साल 2027 के चुनाव की आहट के साथ ही सबसे ज्यादा राजनीतिक गतिविधियां इसी बेल्ट में दिखाई दे रही हैं। राजनीतिक दलों के दिग्गज नेता इस इलाके की हर एक सीट पर पैनी नजर बनाए हुए हैं ताकि सत्ता की चाबी अपने हाथों में ली जा सके।
जातीय समीकरण और मतदाताओं का गणित
पश्चिमी यूपी का चुनाव केवल राजनीतिक दलों की भिड़ंत नहीं, बल्कि जटिल सामाजिक और जातीय समीकरणों का बड़ा खेल है। अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक, इस क्षेत्र में ओबीसी समुदाय सबसे बड़ा सामाजिक समूह है जिसकी हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत मानी जाती है। इसके अलावा मुस्लिम मतदाता लगभग 26 से 28 प्रतिशत, दलित मतदाता 20 से 21 प्रतिशत और जाट समुदाय 5 से 7 प्रतिशत तक मजबूत प्रभाव रखता है। इनके साथ ही गुर्जर, त्यागी और ब्राह्मण मतदाता भी कई सीटों पर जीत और हार तय करने की क्षमता रखते हैं। यही वजह है कि कोई भी दल केवल एक जाति या समुदाय के भरोसे इस क्षेत्र में जीत दर्ज नहीं कर सकता।
बीजेपी, सपा और बसपा की चुनावी रणनीति
भारतीय जनता पार्टी पश्चिमी यूपी में अपने कोर वोट बैंक को मजबूत बनाए रखने के लिए हिंदुत्व, कानून व्यवस्था, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक विकास, निवेश और केंद्र-राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को मुख्य मुद्दा बना रही है। पार्टी गैर-यादव ओबीसी, जाट और दलित वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए लगातार संगठनात्मक अभियान चला रही है।
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दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव आधार को साधने के साथ-साथ ‘पीडीए’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक रणनीति पर पूरा जोर दे रही है। सपा किसानों, युवाओं और जाट समुदाय के एक बड़े हिस्से को अपने पाले में लाने की जुगत में है। वहीं, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) मायावती के नेतृत्व में अपने बिखर चुके दलित वोट बैंक को दोबारा संगठित करने के साथ-साथ ब्राह्मण, ओबीसी और मुस्लिम मतदाताओं तक अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए डिजिटल प्रचार और बूथ स्तर पर एक्टिविटी तेज कर चुकी है।
छोटे दलों की भूमिका और किंग मेकर का खेल
इस पूरे सियासी दंगल में छोटे दलों और क्षेत्रीय क्षत्रपों की भूमिका भी बेहद अहम मानी जाती है। राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) का जाट बहुल इलाकों में अच्छा खासा प्रभाव है, जबकि आजाद समाज पार्टी दलित युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है। कुछ क्षेत्रों में एआईएमआईएम और स्थानीय बागी उम्मीदवार भी मुकाबले को त्रिकोणीय बना देते हैं। पश्चिमी यूपी में कई सीटें ऐसी हैं जहां जीत और हार का अंतर केवल 2 से 5 प्रतिशत वोटों का होता है, ऐसे में ये छोटे दल बड़े राजनीतिक दलों का पूरा समीकरण बिगाड़ने की ताकत रखते हैं और कई सीटों पर किंग मेकर साबित होते हैं।

