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योगी, अखिलेश या मायावती; जानें किसने बदले सबसे ज्यादा नाम

राजनीति के गलियारों में अक्सर एक सवाल गूंजता रहता है कि आखिर नाम में क्या रखा है, मगर उत्तर प्रदेश की सियासत में यही नाम किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ा एजेंडा बन जाता है। यूपी में एक बार फिर जिलों के नाम बदलने की बहस जोरों पर है, जिसकी मुख्य वजह भदोही का नाम दोबारा बदलकर ‘संत रविदास नगर’ करने की हालिया घोषणा है।

सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ जिलों के बोर्ड या नाम बदलने भर से वहां के विकास की तस्वीर बदल जाती है, या फिर यह महज पहचान, संस्कृति और सियासी संदेश देने का एक जरिया मात्र है? पिछले तीन दशकों के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में सत्ता बदलते ही जिलों के नाम बदलने का एक लंबा और दिलचस्प सिलसिला देखने को मिला है।

मायावती सरकार का वह दौर जब एक साथ बदल दिए गए थे नौ जिलों के नाम

उत्तर प्रदेश में नाम बदलने की इस राजनीति का इतिहास काफी पुराना है, मगर साल 2010 से 2011 के बीच बहुजन समाज पार्टी (BSP) की तत्कालीन मुखिया मायावती की सरकार ने एक साथ नौ जिलों के नाम बदलकर इसे एक नया मोड़ दे दिया था। उस दौरान सरकार का आधिकारिक तर्क यह था कि दलित, पिछड़े और बहुजन समाज के महापुरुषों को उचित सम्मान मिलना चाहिए। इस नीति के तहत जिन जिलों के नाम बदले गए थे, उनमें अमेठी का नाम छत्रपति शाहूजी महाराज नगर, कासगंज का नाम कांशीराम नगर, कानपुर देहात का नाम रमाबाई नगर, अमरोहा का नाम ज्योतिबा फुले नगर, हाथरस का नाम महामाया नगर, भदोही का नाम संत रविदास नगर, हापुड़ का नाम पंचशील नगर, शामली का नाम प्रबुद्ध नगर और संभल का नाम बदलकर भीमनगर रखा गया था।

अखिलेश यादव सरकार की वापसी और पुराने नामों की बहाली का फैसला

साल 2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (SP) की सरकार सत्ता में आई और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कार्यभार संभालते ही पिछली सरकार के फैसलों को पलट दिया। सपा सरकार ने मायावती कार्यकाल में बदले गए सभी नौ जिलों के नए नाम रद्द कर दिए और उनके पुराने ऐतिहासिक नाम वापस बहाल कर दिए। उस समय सरकार का पक्ष यह था कि जिलों के पुराने नाम जनता के बीच ज्यादा सहज और प्रचलित हैं, जबकि नए नामों की वजह से प्रशासनिक स्तर पर और आम जनता के बीच भारी भ्रम की स्थिति पैदा हो रही थी। इसी तर्क के साथ सभी नौ जिलों को उनकी पुरानी पहचान वापस लौटा दी गई थी।

बीजेपी सरकार का सांस्कृतिक फोकस और भदोही का नाम बदलने की प्रक्रिया

वर्ष 2017 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार उत्तर प्रदेश की सत्ता में आई, जिसके बाद नाम बदलने की इस राजनीति को एक बिल्कुल नया और सांस्कृतिक आयाम मिला। इस बार राज्य सरकार का मुख्य फोकस ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने पर रहा। बीजेपी ने इसे अपनी सांस्कृतिक विरासत की गौरवशाली वापसी करार दिया, जबकि विपक्ष ने इसे विशुद्ध रूप से राजनीतिक फैसला बताया।

इस कड़ी में इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज और फैजाबाद का नाम अयोध्या किया गया। अब भदोही को फिर से ‘संत रविदास नगर’ बनाने की आधिकारिक तैयारी शुरू हो चुकी है, हालांकि मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी इसके लिए एक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना बाकी है।

क्या वाकई नाम बदलने से बदल जाती है किसी शहर की तकदीर और तस्वीर?

किसी भी जिले का नाम रातों-रात नहीं बदल जाता, बल्कि इसके लिए एक लंबी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है। सबसे पहले राज्य सरकार की ओर से नाम परिवर्तन का एक औपचारिक प्रस्ताव केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को भेजा जाता है। गृह मंत्रालय की मंजूरी मिलने और आधिकारिक अधिसूचना (Notification) जारी होने के बाद ही किसी नए नाम को कानूनी रूप से लागू माना जाता है।

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मगर इसके साथ ही सबसे बड़ा और गंभीर सवाल यह है कि क्या सिर्फ नाम बदलने या बोर्ड बदलने से ज़मीनी हालात बदलते हैं? इस पर समर्थकों का तर्क है कि नाम किसी भी क्षेत्र के इतिहास और सांस्कृतिक गौरव से जुड़े होते हैं, वहीं विरोधियों का मानना है कि जनता को नाम से ज्यादा रोजगार, बेहतर सड़कें, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की सख्त जरूरत है।

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