नेताओं के बेड से शुरू होता नेत्रियों का करियर! क्या आज भी महिलाओं को ‘भोग की वस्तु’ समझती है सियासत
‘राजनीति में महिलाओं को कंप्रोमाइज करना पड़ता है।’ 90 प्रतिशत महिलाओं का राजनीतिक करियर नेताओं के बेड से शुरू होता है। किसी प्रभावशाली नेता के रूम में गए बिना महिलाएं राजनीति नहीं कर सकतीं। बड़ी संख्या में नेता अश्लील सामग्री देखते हैं और इसकी जांच के लिए उनके मोबाइल फोन की पड़ताल होनी चाहिए, क्योंकि डिजिटल डाटा पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता।
बिहार के पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव का यह बयान सियासी बखेड़े का कारण बन गया है। बिहार से नई दिल्ली तक सियासत गर्मा चुकी है। निर्दलीय सांसद पप्पू यादव को महिला आयोग ने नोटिस थमा दिया है। सांसद ने न सिर्फ महिलाओं के चरित्र पर सवाल उठाए हैं बल्कि रंगीन मिजाज नेताओं के चरित्र का हरण करने में भी कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। यदि उनके आरोपों में दम है तो यह वाकई बेहद चिंताजनक तथ्य जान पड़ता है।
33% आरक्षण की चर्चा के बीच ‘चरित्र’ पर सवाल
देशभर में आजकल महिला आरक्षण पर खूब चर्चा चल रही है। लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दिलाने के लिए केंद्र सरकार कसरत कर रही है, मगर किन्हीं कारणों से यह प्रस्ताव विवादों में घिर गया है। राजनीति को कभी अच्छी दृष्टि से नहीं देखा गया है। इसे काजल की कोठरी के समान माना जाता रहा है। इसके बावजूद देश में ऐसे भी नेता रहे हैं, जिन्होंने अपनी ईमानदार कार्यशैली और अच्छे चरित्र के दम पर खूब ख्याति अर्जित की। पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री भी उन्हीं में से एक रहे।
उन्होंने हमेशा सादगी पूर्ण तरीके से सियासत की। सरल एवं विनम्र स्वभाव के कारण वह विरोधियों की भी पसंद रहे। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में महिलाओं ने राजनीति में भी अपना अलग मुकाम कायम किया है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहकर महिलाओं ने जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया है।
इस वजह से होता रहा है कि महिलाओं का शोषण
इसमें दो राय नहीं कि पूरी दुनिया में आज भी महिलाओं को भोग की वस्तु समझने की मानसिकता में बदलाव नहीं आ पाया है। राजनीति में किसी महिला के लिए शीर्ष तक पहुंचना इतना आसान नहीं है। एकजुटता की कमी के कारण महिला वर्ग अक्सर शोषण का शिकार होता आया है।
महिला आरक्षण के लिए भी उन्हें आजादी के बाद से इंतजार करना पड़ रहा है। सांसद पप्पू यादव के बयान का समर्थन नहीं किया जा सकता। उन्हें बोलने से पहले सोच-विचार कर लेना चाहिए था। आज की नारी पहले के मुकाबले कतई कमजोर नहीं है। अपना भला-बुरा वह भलीभांति समझती है। हां नेताओं के चरित्र की कोई गारंटी नहीं हो सकती। समाज में रंगीन मिजाज प्रवृत्ति के नेताओं की कोई कमी नहीं है।
वैसे राजनीति में महिलाओं का संघर्ष पितृसत्तात्मक सोच, संरचनात्मक बाधाओं, धनबल-बाहुबल की चुनौती और हिंसा के बीच अपनी जगह बनाने की लंबी लड़ाई है। समानता, प्रतिनिधित्व, और महिला आरक्षण के बावजूद महिलाओं को अभी भी उम्मीदवारी और निर्णयों में असमानता का सामना करना पड़ रहा है, जो स्थायी सशक्तिकरण के लिए चुनौती है। राजनीतिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी में कई बाधाएं आती हैं।
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भेदभावपूर्ण कानूनों और संस्थाओं के माध्यम से संरचनात्मक अवरोध अभी भी महिलाओं के चुनाव लड़ने के विकल्पों को सीमित करते हैं। क्षमता में अंतर के कारण महिलाओं के पास पुरुषों की तुलना में प्रभावी नेता बनने के लिए आवश्यक शिक्षा, संपर्क और संसाधन होने की संभावना कम होती है। हालांकि जहां चाह, वहां राह, जिस महिला ने आगे बढ़ने की ठान ली, वह दुनिया को अचंभित भी कर देती है।

