SIR से उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल शहरों में मतदाता घटने पर उठे सवाल कितने उचित
UP voter list news 2026: यूपी में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद सामने आई ड्राफ्ट मतदाता सूची ने सिर्फ राजनीतिक दलों को ही नहीं बल्कि आम मतदाताओं को भी सोच में डाल दिया है। जिन लोगों ने सालों से मतदान किया है, वे अचानक खुद को सूची से बाहर देखकर हैरान हैं। सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं बल्कि पहचान और लोकतांत्रिक हिस्सेदारी का भी बन गया है।
आंकड़े क्या कहते हैं
ड्राफ्ट सूची के अनुसार पूरे सूबे में औसतन 18.70 फीसदी वोटरों के नाम हटाए गए हैं। जिन 10 जिलों में मुस्लिम जनसंख्या 33 से 50 फीसदी के बीच है, वहां ये औसत 18.75 फीसदी रहा। सतह पर देखने पर मुस्लिम बहुल इलाकों और अन्य जिलों के आंकड़ों में खास अंतर नहीं दिखता। इसके बावजूद बहस इसलिए तेज है क्योंकि नाम कटने का पैमाना बहुत बड़ा है।
प्रदेश में मुस्लिम आबादी (Muslim-majority districts) लगभग 19.26 फीसदी मानी जाती है। रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, अमरोहा, बलरामपुर, बरेली, मेरठ और बहराइच ऐसे शहर हैं जहां मुस्लिम आवाम 33 से 50 फीसदी के बीच है। ड्राफ्ट सूची में बलरामपुर में 25.98 फीसदी, मेरठ में 24.65 %, बरेली में 20.99 फीसदी और बहराइच में 20.44 फीसदी नाम हटे हैं।
चुनाव आयोग की दलील पर एक नजर
चुनाव आयोग का कहना है कि नाम हटने की वजहें तकनीकी और प्रशासनिक हैं। मृत मतदाता, स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर बस चुके लोग, दो जगह पंजीकरण और समय पर एन्यूमरेशन फॉर्म जमा न होना इसकी मुख्य वजहें बताई जा रही हैं। आयोग का यह भी कहना है कि यह सिर्फ प्रारंभिक सूची है और आपत्तियों के बाद कई नाम दोबारा जोड़े जाएंगे।
आयोग के अधिकारियों के अनुसार इस प्रक्रिया का उद्देश्य किसी वर्ग को प्रभावित करना नहीं बल्कि वोटर लिस्ट को अद्यतन और भरोसेमंद बनाना है।
विपक्ष ने जताई आपत्ति
विपक्ष इस सफाई से सहमत नहीं है। समाजवादी पार्टी का कहना है कि प्रदेश से लाखों लोग रोजगार के लिए देश और विदेश में रहते हैं। ऐसे में फॉर्म जमा न कर पाने वालों के नाम काटना उनके मताधिकार पर सीधा असर डालता है। सपा ने आरोप लगाया है कि अल्पसंख्यक और विपक्ष समर्थक इलाकों में नाम कटने की संख्या ज्यादा है।
कांग्रेस ने भी इसी मुद्दे पर चिंता जताई है। पार्टी का कहना है कि बिना ठोस जांच के बड़ी संख्या में वोटरों को फर्जी बताना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा है। विपक्षी दलों का दावा है कि यदि गड़बड़ी साबित होती है तो वे कानूनी कदम भी उठाएंगे।
BJP का जवाब
भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों को खारिज किया है। पार्टी का कहना है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए गलत और अधूरे रिकॉर्ड हटाना जरूरी है। BJP के अनुसार विपक्ष वोटर लिस्ट जैसे संवेदनशील मुद्दे को सिर्फ राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।
शहरी जिलों की अलग ही इमेज
गहराई से नजर डाले तो सबसे ज्यादा वोट कटने वाले शहरों में कई शहरी और औद्योगिक क्षेत्र भी शामिल हैं। लखनऊ में करीब 30 फीसदी, गाजियाबाद में 28.83 फीसदी, कानपुर में 25.50 फीसदी और प्रयागराज में 24.64 फीसदी वोटरों के नाम हटे हैं। इन इलाकों में मुस्लिम आबादी राज्य के औसत से ज्यादा नहीं है। इससे यह तर्क सामने आता है कि प्रक्रिया किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रही।
बलरामपुर क्यों चर्चा में
नेपाल सीमा से सटा बलरामपुर इस बहस का केंद्र बन गया है। SIR से पहले यहां करीब 15.83 लाख मतदाता थे। ड्राफ्ट सूची में यह संख्या घटकर 11.71 लाख रह गई। अफसरों के अनुसार बड़ी संख्या में फॉर्म नहीं मिल पाए। कई मतदाताओं को अनुपस्थित या स्थायी रूप से स्थानांतरित की श्रेणी में रखा गया।
स्थानीय BJP नेताओं का कहना है कि जिले से बड़ी संख्या में लोग बाहर काम करने जाते हैं। इसका असर मतदान प्रतिशत पर भी पड़ा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां मतदान राज्य औसत से काफी कम रहा था।
विधानसभा स्तर पर बहस
मुजफ्फरनगर, संभल, सहारनपुर और बिजनौर जैसे जिलों के विधानसभा आंकड़े भी सवाल खड़े कर रहे हैं। संभल जिले में 3.18 लाख नाम कटे। मुजफ्फरनगर में 3.44 लाख और सहारनपुर में 4.32 लाख वोटर सूची से बाहर हुए। विपक्ष का कहना है कि जिन सीटों पर उनका प्रभाव ज्यादा है, वहां कटौती भी ज्यादा दिखती है। BJP इसे संयोग और प्रशासनिक प्रक्रिया का परिणाम बता रही है।
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2027 चुनाव और भरोसे की परीक्षा
राजनीतिक नजरिए से देखें तो यह विवाद 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भरोसे की बड़ी परीक्षा बन गया है। विपक्ष इसे मतदाताओं को हतोत्साहित करने की कोशिश बता रहा है। वहीं सरकार इसे पारदर्शिता का कदम कह रही है। अंतिम तस्वीर तब साफ होगी जब आपत्तियों के बाद कितने नाम दोबारा जुड़ते हैं और चुनाव आयोग इस पूरी प्रक्रिया को कितनी खुली और निष्पक्ष तरीके से पूरा करता है।

