चोरी तो चोरी ऊपर से सीना जोरी, चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर उठे कई अहम सवाल
लोकसभा (Lok Sabha) में विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) राहुल गांधी ने हाल ही में मतदाता सूची से जुड़ी कई अनियमितताओं को उजागर किया, जिसमें खासतौर पर महाराष्ट्र और कर्नाटक के मामलों को सामने रखा गया। बिहार की मतदाता सूची में भी संशोधन को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए, जो चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं। इन खुलासों के बाद जनमत सर्वेक्षणों ने दिखाया कि आम जनता के बीच चुनाव आयोग की छवि प्रभावित हुई है।
बिहार में विपक्षी दलों ने ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ की योजना बनाई थी जो चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और वोटर के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा था। मगर इस अवसर का चुनाव आयोग ने स्वयं एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के आयोजन से फायदा उठाया, जो कि रविवार यानी छुट्टी के दिन हुई। इस कदम को कई लोग विपक्ष के दबाव को कम करने की कोशिश के रूप में देख रहे थे।
चुनाव आयुक्त का भाषण ऐसा कि हो रही आलोचना
हालांकि लोगों को उम्मीद थी कि आयोग कोई ठोस घोषणा करेगा जिससे उसकी साख बच सके, मगर जो हुआ वो निराशाजनक रहा। मुख्य चुनाव आयुक्त के भाषण की भाषा को लेकर भी काफी आलोचना हुई, जिसे कईयों ने राजनीति में देखे जाने वाले तैयार भाषण जैसा बताया। उनकी बातों में अक्सर हल्के-फुल्के और फिल्मी संवाद नजर आए, जिससे उनके गंभीर भूमिका निभाने वाले व्यक्तित्व पर सवाल उठे। उन्होंने आलोचकों के साथ बहस करने का रूख अपनाया, जो एक निष्पक्ष अंपायर की अपेक्षा से बिल्कुल विपरीत था।
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उठ रहे हैं तरह तरह के सवाल
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उठाए गए सवालों का जवाब या तो टालमटोल भरा था या फिर प्रश्न से मेल नहीं खाता था। जैसे कि राहुल गांधी द्वारा मांगे गए हलफनामे को लेकर पूछे गए सवाल पर जवाब मिला कि केवल स्थानीय मतदाता ही आपत्ति दर्ज कर सकते हैं, जिससे यह स्पष्ट नहीं हुआ कि अनुराग ठाकुर का वायनाड में मतदाता होना आवश्यक क्यों नहीं था। समाजवादी पार्टी द्वारा जमा किए गए हलफनामों पर जवाब न देने के सवाल पर आयोग ने यह कहते हुए इनकार किया कि ऐसा कोई हलफनामा ही नहीं मिला, जो पूरी तरह गलत साबित होता है। (election commission credibility)
बिहार में मतदाता सूची (voter list) में त्रुटियों को लेकर सवाल उठते रहे कि क्या इससे वोटर धोखाधड़ी की संभावना बढ़ती है, तो आयोग ने यह तर्क दिया कि गलत नाम वाले मतदाताओं ने मतदान नहीं किया, मगर यह कथन तथ्यात्मक आंकड़ों पर आधारित नहीं था। आयोग ने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि बिहार में कितने ऐसे आवेदन बीएलओ द्वारा खारिज किए गए, कितने नाम गलत तरीके से जोड़े गए और कितने घुसपैठिए मतदाता सूची में शामिल हो गए।
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इस दौरान आयोग ने सीसीटीवी फुटेज जैसे प्रमाण मांगने पर इसे ‘नानी की गरिमा’ से जोड़ने की बात की और मशीन द्वारा पढ़े जा सकने वाले डेटा को खतरा बताकर खारिज कर दिया। बिहार के गांवों में बीएलओ द्वारा राजनीतिक पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाकर मृत या पलायन किए गए लोगों की सूची बांटने के आरोप को भी आयोग ने सिरे से खारिज किया।
सबसे चिंताजनक बात यह रही कि आयोग ने स्पष्ट कर दिया कि मतदाता सूची में नाम जोड़ना या सुधारना नागरिक का कर्तव्य है, न कि आयोग का। किसी भी आरोप की जांच करने से साफ इनकार कर दिया गया। चुनाव आयोग ने खुद को एक मजबूत पर्वत की तरह खड़ा बताया, जिसका मतलब साफ था कि अब वे किसी भी दबाव में आने को तैयार नहीं हैं।
ये सारी घटनाक्रम न केवल चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है बल्कि लोकतंत्र के मूल आधार यानी निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया पर भी छाया डालता है। आम जनता के लिए यह चिंता का विषय है कि आखिरकार उनका वोट और उनकी आवाज़ किस हद तक सुरक्षित है।


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