यूपी चुनाव 2027: मायावती का ‘साइलेंट मास्टर प्लान’, पूर्वांचल से सपा-बीजेपी का सियासी गणित बिगाड़ने की तैयारी
Mayawati Master Plan: उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर सियासी सरगर्मियां अभी से तेज हो चुकी हैं। जहां भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अपनी सत्ता बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है, वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) दोबारा सरकार बनाने का ख्वाब देख रही है। लेकिन इस बीच, जिस बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को कई राजनीतिक विश्लेषक मुख्य रेस से बाहर मान चुके थे, वह चुपचाप बैकस्टेज एक ऐसा ‘मास्टर प्लान’ तैयार कर रही है जो दोनों ही बड़े दलों की नींद उड़ा सकता है। बसपा प्रमुख मायावती इस बार बेहद शांत रहकर जमीनी स्तर पर अपनी गोटियां सेट कर रही हैं।
पूर्वांचल बना बसपा का नया लॉन्चिंग पैड: 160 सीटों का समीकरण
बसपा का इस बार सबसे बड़ा और मुख्य फोकस पूर्वांचल के क्षेत्रों पर दिखाई दे रहा है। यूपी की सत्ता का रास्ता पूर्वांचल से होकर ही गुजरता है, क्योंकि यहां की लगभग 160 से ज्यादा विधानसभा सीटें सीधे तौर पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करती हैं। वाराणसी, गाजीपुर, जौनपुर, आजमगढ़, मऊ, बलिया, गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, संत कबीर नगर, भदोही, मिर्जापुर, सोनभद्र और प्रयागराज जैसे जिलों में जातीय समीकरण हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाते आए हैं। बसपा इसी चक्रव्यूह को भेदने की तैयारी में है।
पुराना वोट बैंक और ‘सर्वजन हिताय’ मॉडल की वापसी
अगर पूर्वांचल के सामाजिक आंकड़ों को समझें, तो यहां करीब 21% दलित आबादी, 35 से 40% ओबीसी (OBC) वोटर, 18 से 20% मुस्लिम वोटर और 18 से 20% सवर्ण वोटर चुनावी हार-जीत तय करते हैं। बसपा का कोर आधार हमेशा से दलित वोट बैंक रहा है, लेकिन मायावती अब सिर्फ इसी दायरे तक सीमित नहीं रहना चाहतीं। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पार्टी एक बार फिर अपने साल 2007 वाले ऐतिहासिक ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ के फॉर्मूले को दोहराने की कोशिश में है, जिसने कभी बसपा को 206 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार दिलाई थी।
चुनावी इतिहास की चुनौतियां और जमीनी सक्रियता
पिछले कुछ चुनाव बसपा के लिए बेहद निराशाजनक रहे हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां पार्टी का खाता तक नहीं खुला, वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में 22.3% वोट शेयर मिलने के बाद भी झोली में सिर्फ 19 सीटें आईं। 2019 में सपा के साथ गठबंधन के दम पर 10 सांसद जरूर जीते, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी महज एक सीट पर सिमट गई। गिरावट का यह सिलसिला 2024 के लोकसभा चुनाव में भी जारी रहा, जहां पार्टी का वोट शेयर गिरकर 9.38% रह गया और सीटों की संख्या शून्य रही।
इन आंकड़ों के बावजूद बसपा प्रमुख हताश होने के बजाय संगठन को नए सिरे से मजबूत करने में जुटी हैं। पूर्वांचल में जमीनी हलचल को बढ़ाने का जिम्मा घोसी के पूर्व सांसद अतुल राय ने संभाला है, जो लगातार इन जिलों का दौरा कर रैलियां और बैठकें कर रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय राजनीति में हलचल बढ़ गई है।
अति पिछड़ों और मुस्लिमों पर नजर: बदल सकता है सीटों का खेल
बसपा की नई रणनीति बेहद साफ है। पार्टी दलितों के साथ-साथ अति पिछड़ों, निषाद, बिंद, राजभर, मौर्य, कुर्मी और मुस्लिम मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए चौपालें और बैठकें कर रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर बसपा अपने पारंपरिक 10 से 12% वोट बैंक को वापस पूरी तरह एकजुट कर लेती है और उसमें 5 से 7% नए सामाजिक समूहों (ओबीसी और मुस्लिम) को जोड़ने में कामयाब हो जाती है, तो वह 2027 में कई त्रिकोणीय मुकाबलों में पासा पलट सकती है।
बीजेपी के वोट बैंक में सेंध और सपा के ‘PDA’ को खतरा
बसपा की इस अंदरूनी सक्रियता पर बीजेपी और सपा दोनों की पैनी नजरें टिकी हैं। बीजेपी के लिए चिंता की बात यह है कि गैर-जाटव दलित वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा पिछले कुछ समय से उसके पाले में था; अगर यह वोट दोबारा हाथी की तरफ लौटता है, तो बीजेपी को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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दूसरी तरफ, अखिलेश यादव का ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला तभी पूरी तरह कामयाब हो सकता है जब दलित और मुस्लिम वोट एकजुट होकर सपा के साथ रहें। अगर मायावती इन दोनों वर्गों को अपने पाले में खींचने में सफल रहीं, तो सपा का चुनावी गणित पूरी तरह बिखर सकता है। मायावती फिलहाल ज्यादा बयानबाजी न करके सीधे कैडर और संगठन को धार दे रही हैं, जो कि उनकी पुरानी और सबसे मारक राजनीतिक शैली मानी जाती है। अब देखना यह होगा कि क्या पूर्वांचल वाकई 2027 में बसपा की राजनीतिक वापसी का जरिया बन पाता है।

