पूर्वांचल में बीजेपी की जीत की गारंटी या अखिलेश यादव का नया चक्रव्यूह? यूपी चुनाव से पहले शुरू हुआ जादुई आंकड़ों का खेल
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा दो सौ दो सीटों का है लेकिन कई बार सत्ता की चाबी उन छोटे दलों के हाथ में होती है जिनके पास कुछ ही विधायक होते हैं।
आगामी दो हजार सत्ताईस के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल ने यह साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी अपना दल एस एनडीए गठबंधन के साथ ही चुनावी मैदान में उतरेगी।
भले ही यह केवल एक गठबंधन का औपचारिक ऐलान लगे लेकिन इसके पीछे पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश के दर्जनों जिलों का बेहद अहम और जटिल जातीय गणित छिपा हुआ है।
पार्टी के पास मौजूदा समय में तेरह विधायक हैं और राज्य के कुर्मी समाज के बीच उनका प्रभाव काफी मजबूत माना जाता है। ऐसे में यह सवाल बड़ा हो गया है कि क्या अनुप्रिया पटेल का यह कदम भारतीय जनता पार्टी को दो हजार सत्ताईस में निर्णायक बढ़त दिला पाएगा या फिर समाजवादी पार्टी इस वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब होगी।
कुर्मी वोटों का दम और पूर्वांचल का सियासी समीकरण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में कुर्मी समुदाय की कुल आबादी करीब सात से नौ प्रतिशत के आसपास है। यह वोट बैंक पूरे राज्य में एक समान रूप से नहीं फैला है बल्कि पूर्वांचल और मध्य यूपी की लगभग सत्तर से अस्सी विधानसभा सीटों पर इसका सीधा और गहरा असर है।
मिर्जापुर, प्रयागराज, कौशांबी, प्रतापगढ़, वाराणसी, जौनपुर और सोनभद्र जैसे जिलों में कुर्मी मतदाता कई सीटों पर हार और जीत का फैसला करने की पूरी ताकत रखते हैं। यही मुख्य वजह है कि अपना दल एस का राजनीतिक कद केवल उसके तेरह विधायकों की संख्या से कहीं ज्यादा बड़ा आंका जाता है। बीजेपी लंबे समय से गैर यादव और अन्य पिछड़ा वर्ग को एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रही है और अनुप्रिया पटेल के साथ यह तालमेल उसी रणनीति की सबसे मजबूत कड़ी साबित होता है।
बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग और सपा की पीडीए रणनीति
भारतीय जनता पार्टी की रणनीति साफ तौर पर सवर्णों, गैर यादव ओबीसी और अन्य छोटे सामाजिक समूहों को मिलाकर एक व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार करने की है। इसमें अपना दल एस की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है ताकि चुनावी वैतरणी आसानी से पार की जा सके।
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दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी भी पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले के जरिए पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पकड़ को और ज्यादा मजबूत करने में जुटी हुई है। यदि विपक्षी दल कुर्मी समाज के एक बड़े हिस्से को अपनी तरफ खींचने में सफल होते हैं, तो आने वाले चुनाव में मुकाबला बेहद रोमांचक और कड़ा हो जाएगा।
यह साफ है कि यूपी की राजनीति में केवल बड़े दल ही नहीं बल्कि छोटे और क्षेत्रीय सहयोगी दल भी सत्ता का पूरा रास्ता तय करते हैं। दो हजार सत्तावीस का यह मुकाबला केवल राजनीतिक दलों की भिड़ंत नहीं बल्कि सामाजिक समीकरणों की एक बड़ी और दिलचस्प परीक्षा बनने जा रहा है।

