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PDA बनाम सनातन: 2027 के चुनाव से पहले पूर्वांचल में छिड़ने वाली है सबसे बड़ी सियासी जंग

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पूर्वांचल हमेशा से सत्ता की चाबी रहा है। अब 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले गंगा के घाटों से लेकर गांव की चौपालों तक सियासी बिसात बिछने लगी है।

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव जहां अपने पुराने और भरोसेमंद ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को धार देने में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ पूर्वांचल में एक नई ‘सनातन’ स्क्रिप्ट तैयार हो रही है। इस नई पटकथा के केंद्र में प्रतापगढ़ का कुंडा है, जहां से एक ऐसा धार्मिक-सियासी संदेश निकलने वाला है, जो यूपी के चुनावी समीकरणों को पूरी तरह से बदल सकता है।

राजा भैया का मास्टरस्ट्रोक और बाबा बागेश्वर की एंट्री

जनसत्ता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कुंडा के बाहुबली विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने एक बड़ा सियासी और धार्मिक दांव चला है। राजा भैया ने मशहूर कथावाचक और बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को कुंडा में श्री राम कथा के लिए आमंत्रित किया है। यह भव्य आयोजन इसी साल नवंबर में होना प्रस्तावित है।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि पूर्वांचल में जब भी धर्म और सियासत का संगम होता है, तो उसका सीधा असर वोट बैंक पर पड़ता है। राजा भैया के प्रभाव वाले क्षेत्र में लाखों की भीड़ जुटने का अनुमान है, जिसे सिर्फ आस्था के चश्मे से नहीं, बल्कि 2027 के बड़े सियासी संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है।

अखिलेश का ‘PDA’ बनाम बीजेपी का ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में लड़ाई साफ तौर पर दो विचारधाराओं के बीच बंटती नजर आ रही है। अखिलेश यादव सामाजिक न्याय और जातियों को एकजुट कर अपना वोट बैंक मजबूत करना चाहते हैं। उनका पूरा फोकस अब पीडीए पर टिका है। इसके ठीक उलट, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक और सनातनी पहचान को आगे रख रहे हैं।

अयोध्या, काशी और मथुरा के बाद अब कुंडा का यह आयोजन बीजेपी के ‘सनातन एकीकरण’ के अघोषित एजेंडे को मजबूत कर सकता है। माना जा रहा है कि जातियों में बंटे हिंदू वोटरों को सनातन के नाम पर एकजुट कर योगी आदित्यनाथ को लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाने की राह आसान की जा सकती है।

क्या कुंडा से तय होगी यूपी चुनाव की दिशा?

पूर्वांचल के बारे में एक बात मशहूर है कि यहां सिर्फ वोट नहीं पड़ते, बल्कि प्रदेश का ‘माहौल’ बनता है। नवंबर में होने वाली इस राम कथा से जो माहौल बनेगा, वह विपक्ष के लिए कड़ी चुनौती खड़ी कर सकता है। जहां विपक्षी दल बीजेपी पर धर्म के राजनीतिकरण का आरोप लगाते हैं, वहीं सत्ता पक्ष विपक्ष पर तुष्टिकरण की राजनीति करने के तीर छोड़ता है। चुनावी मौसम आते-आते बाबा बागेश्वर के बेबाक बोल और सनातनी हुंकार इस बहस को और भी तीखा कर देंगे।

2027 से पहले यूपी की सियासत में भूचाल, शिवपाल-आजम की गुप्त मुलाकात और बीजेपी के नए ‘मास्टरस्ट्रोक’ से गरमाया पारा

फिलहाल, लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सबकी निगाहें कुंडा के इस आयोजन पर टिकी हैं। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि राजा भैया के मंच से उठने वाली सनातन की गूंज पूर्वांचल के जातीय गुणा-गणित को कितना बदल पाती है और आने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में इसका असली फायदा किसे मिलता है।

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