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अखिलेश यादव बने ‘राजा बाबू’? ओपी राजभर के इस ट्वीट ने यूपी की राजनीति में मचाया गदर

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानों के तीर कब समीकरण बदल दें, कहना मुश्किल है। यूपी की सियासी बिसात पर इस समय एक नए बयान ने हलचल मचा दी है, जिसने समाजवादी पार्टी (सपा) के थिंक टैंक को गहरी चिंता में डाल दिया है। सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने सपा मुखिया अखिलेश यादव की तुलना बॉलीवुड फिल्म के ‘राजा बाबू’ से कर दी है। यह सिर्फ एक जुबानी हमला नहीं है, बल्कि इसके पीछे गैर-यादव ओबीसी (OBC) वोट बैंक में सेंधमारी करने की एक सोची-समझी रणनीति छिपी है, जो सपा के पीडीए (PDA) फॉर्मूले को सीधी चुनौती दे रही है।

पीडीए (PDA) के बदलते अर्थ और राजभर का तीखा तंज

दरअसल, यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने अपने चर्चित ‘PDA’ फॉर्मूले में शामिल ‘A’ अक्षर को एक नया मतलब दिया। अखिलेश ने इस बार ‘A’ का मतलब ‘आदिवासी’ बताया। गौर करने वाली बात यह है कि इससे पहले सपा की तरफ से ‘A’ का मतलब कभी ‘अल्पसंख्यक’ तो कभी ‘अगड़ा’ बताया जा चुका है।

इसी बदलते रंग पर तंज कसते हुए कैबिनेट मंत्री ओपी राजभर ने सोशल मीडिया पर लिखा कि उन्हें डर है कि अखिलेश किसी दिन सम्मेलन में ‘A’ का मतलब कुछ और न बता दें। उन्होंने अखिलेश यादव की तुलना गोविंदा की मशहूर फिल्म ‘राजा बाबू’ से कर दी, जिसमें मुख्य किरदार कभी डॉक्टर, कभी वकील, तो कभी पुलिस की वर्दी पहनकर अलग-अलग रूप बदलता है।

गैर-यादव ओबीसी वोट बैंक पर टिकी यूपी की सत्ता की चाबी

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राजभर का यह बयान महज एक मजाक नहीं है। यूपी की सत्ता का रास्ता गैर-यादव पिछड़ी जातियों से होकर गुजरता है। इस वर्ग में राजभर, कुर्मी, निषाद, मौर्य, शाक्य, सैनी, लोध और कश्यप जैसी प्रभावशाली जातियां शामिल हैं। राजभर का सीधा आरोप है कि समाजवादी पार्टी में गैर-यादव ओबीसी समुदाय को वह प्रतिनिधित्व और सम्मान नहीं मिलता, जिसके वे हकदार हैं। इस बयान के जरिए जमीन पर यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सपा केवल एक विशेष वर्ग की राजनीति करती है।

क्या लड़खड़ाती जुबान से बीजेपी को मिलेगा सियासी फायदा?

पिछले एक दशक में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने छोटे क्षेत्रीय दलों और विभिन्न जातीय नेताओं को साथ लेकर एक मजबूत सामाजिक गठबंधन तैयार किया है। लोकसभा चुनाव में सपा के पीडीए कार्ड ने उसे बड़ी कामयाबी दिलाई थी, लेकिन अब उसी कार्ड की काट ढूंढने के लिए एनडीए के सहयोगी दल जमीन पर एक्टिव हो चुके हैं। यदि राजभर का यह नैरेटिव वोटरों के बीच असर कर गया, तो विपक्षी वोटों में बिखराव होना तय है।

इस पूरी सियासी रस्साकशी से बीजेपी और एनडीए गठबंधन को कई बड़े फायदे मिल सकते हैं:

  • गैर-यादव ओबीसी में पैठ मजबूत: पिछड़ी जातियों के बीच बीजेपी की पकड़ और गहरी होगी।

  • एनडीए सहयोगियों की उपयोगिता: राजभर जैसे जमीनी नेताओं का कद गठबंधन में और बढ़ेगा।

  • विपक्षी वोटों का बिखराव: सपा के कोर वोट बैंक में सेंध लगने से विपक्ष कमजोर होगा।

  • सामाजिक गठबंधन को मजबूती: हर वर्ग को साथ लेकर चलने का नैरेटिव मजबूत होगा।

यूपी चुनाव से पहले पंकज चौधरी की नई टीम घोषित, सपा के PDA फॉर्मूले को ध्वस्त करने का मास्टरप्लान तैयार

चुनावी राजनीति में हकीकत से ज्यादा ‘धारणा’ यानी परसेप्शन मायने रखता है। सपा भले ही खुद को सभी पिछड़ों की आवाज बताए, लेकिन राजभर के इस ‘राजा बाबू’ वाले वार ने यूपी की राजनीति में बयानों के जरिए जातीय समीकरण साधने की नई बहस छेड़ दी है। अब देखना यह है कि अखिलेश यादव इस सियासी चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए क्या कदम उठाते हैं।

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