इलाज से पहले ही पता चलेगा पाई-पाई का हिसाब, प्राइवेट नर्सिंग होम्स पर लगाम लगाने के लिए आ गया नया नियम
अस्पतालों में इलाज के नाम पर मनमाने बिल वसूलने के दौर पर अब लगाम लगने जा रही है। उत्तर प्रदेश सरकार के सख्त फैसलों के बाद अब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने भी देश भर के अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों की मनमानी पर पूरी तरह से नकेल कसने की तैयारी कर ली है। अक्सर किसी भी परिवार में बीमारी आने पर सबसे बड़ी चिंता मरीज की सेहत के साथ-साथ इस बात की होती है कि आखिर कुल बिल कितना बैठेगा। आईसीयू या सामान्य बेड का किराया क्या होगा, जांचों के कितने पैसे लगेंगे और दवाइयों का खर्च कितना आएगा। कई बार इलाज के बीच में ही खर्च बजट से बाहर हो जाता है। इसी आर्थिक शोषण को खत्म करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सख्त निर्देश जारी किए हैं।
प्रमुख जगहों पर सार्वजनिक होगी रेट लिस्ट
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के ताजा आदेश के अनुसार, सभी अस्पतालों, नर्सिंग होम्स और स्वास्थ्य संस्थानों को अपनी हर सेवा व सुविधा की दरें परिसर में ऐसी जगहों पर प्रदर्शित करनी होंगी जहां मरीज और उनके तीमारदार उन्हें आसानी से देख और पढ़ सकें। इसका सीधा अर्थ यह है कि इलाज शुरू होने से पहले ही परिवार को यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगा कि किस टेस्ट, परामर्श या बेड के लिए कितने पैसे चुकाने होंगे। अगर अस्पताल में इलाज और जांच की आधिकारिक रेट लिस्ट नहीं दिखाई देती है, तो मरीज और उनके परिजन सीधे सवाल खड़े कर सकते हैं और प्रशासनिक शिकायत भी दर्ज करा सकते हैं।
19 राज्यों में क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट पर कड़ाई
केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे अपने यहां लागू स्वास्थ्य नियमों की समीक्षा करें और इनका शत-प्रतिशत पालन सुनिश्चित कराएं। विशेष रूप से जिन 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ‘क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स एक्ट’ लागू है, वहां स्वास्थ्य सेवाओं और सुविधाओं की दरें सार्वजनिक करने के नियम को बिना किसी ढिलाई के लागू कराने पर जोर दिया गया है। नियमों के तहत स्वास्थ्य संस्थानों को अपनी सेवाओं, प्रक्रियाओं और जांचों के शुल्क का बोर्ड लगाना अनिवार्य है ताकि आम नागरिकों को किसी भी जानकारी के लिए भटकना न पड़े।
मरीजों को कैसे मिलेगा सीधा फायदा
इस नए दिशा-निर्देश से आम जनता को सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि वे इलाज से पहले ही कुल संभावित खर्च का सही आकलन कर सकेंगे। यदि किसी मरीज को भर्ती कराना है, तो परिवार पहले से ही बेड चार्ज, डॉक्टर विजिट और पैथोलॉजी टेस्ट की दरों को देखकर अपना बजट तैयार कर सकता है। इतना ही नहीं, फाइनल बिलिंग के समय यदि कोई अतिरिक्त या संदिग्ध शुल्क जोड़ा जाता है, तो परिवार प्रदर्शित बोर्ड पर लिखी आधिकारिक दरों के आधार पर सीधे प्रबंधन से स्पष्टीकरण मांग सकता है। इससे बिलिंग को लेकर होने वाले रोजमर्रा के विवादों में भारी कमी आएगी।
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यूपी के दवा मॉडल से कितनी अलग है यह व्यवस्था
गौरतलब है कि इससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने भी दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता लाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया था। यूपी के सभी अस्पतालों, फार्मेसियों और मेडिकल स्टोरों को वेबसाइट और क्यूआर कोड के जरिए दवाओं के खरीद मूल्य (क्रय मूल्य) और बिक्री मूल्य (एमआरपी) को सार्वजनिक करने की दिशा में कार्य करने को कहा गया है। हालांकि दोनों पहलों का उद्देश्य मरीजों को वित्तीय शोषण से बचाना है, लेकिन यूपी का मॉडल दवाओं की खरीद-फरोख्त से जुड़ा है, जबकि केंद्र सरकार का यह ताजा नियम अस्पताल के बेड, सर्जरी, कंसल्टेंसी और पैथोलॉजी जांचों की फिक्स रेट लिस्ट से संबंधित है। अब सारा दारोमदार इस बात पर है कि स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी इन नियमों की निगरानी कितनी तत्परता से करते हैं।

