क्या ओवैसी का तिलिस्म तोड़ पाएंगे, यूपी में आ गए हैं अखिलेश-राहुल के दो ‘ब्रह्मास्त्र’
उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजकल दो युवा मुस्लिम चेहरों की खूब चर्चा हो रही है। इनमें पहली हैं समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन और दूसरे हैं कांग्रेस के सांसद इमरान प्रतापगढ़ी। इमरान भले ही प्रतापगढ़ के हैं मगर हसन कैराना से चुनकर आई हैं। इन दोनों नेताओं ने जिस अंदाज़ में बिहार में महागठबंधन के लिए ज़ोरदार प्रचार की कमान संभाली है, उसे देखकर यही लगता है कि 2027 के यूपी चुनावों में भी ये पूरी ताक़त झोंक देंगे। यही कारण है कि अब लोग इन्हें असदुद्दीन ओवैसी के एक मज़बूत विकल्प के तौर पर देखने लगे हैं।
बिहार में जहाँ महागठबंधन और एनडीए के बीच कड़ी टक्कर है, वहीं AIMIM यानी ओवैसी ने भी अपने उम्मीदवार उतारकर मुस्लिम वोटों को बाँटने की संभावना पैदा कर दी है। इसी बिखराव को रोकने के लिए अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने इकरा और इमरान पर बड़ा दाँव लगाया है।
माना जा रहा है कि यूपी के 2027 विधानसभा चुनाव में भी कुछ ऐसा ही माहौल बनेगा। पिछले यूपी चुनाव में ओवैसी ने 403 में से 100 सीटों पर प्रत्याशी उतारकर सपा के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की थी। हालांकि, उनका प्रदर्शन बेहद ख़राब रहा और उनकी पार्टी को नोटा से भी कम वोट मिले थे। 2017 में भी 38 सीटों पर लड़ने के बावजूद परिणाम निराशाजनक ही थे। फिर भी, वोट शेयर में मामूली बढ़त तो हुई ही थी। इन सब को देखते हुए, यह तय है कि ओवैसी 2027 में भी प्रत्याशी उतारकर मुस्लिम वोटों को बाँटने का पूरा प्रयास करेंगे। लेकिन, इकरा और इमरान की यह जोड़ी इस बिखराव को मुश्किल बना सकती है।
सादगी और शायरी का संगम, इकरा और इमरान
इकरा हसन जहाँ अपनी सादगी भरे व्यवहार के लिए जानी जाती हैं, वहीं इमरान अपनी शायरी के अंदाज़ से महफ़िलों में छाए रहते हैं। इकरा ने एक बार कहा था, “मेरे क्षेत्र में सिर्फ 30% मुसलमान हैं, फिर भी मुझे सबने प्यार और आशीर्वाद दिया। क्योंकि हमारा देश धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि हिंदुस्तानियत के दम पर एक दूसरे से जुड़ा है। जो लोग हमें बाँटने और तोड़ने की कोशिश करते हैं, उन्हें सिर्फ़ मोहब्बत से ही जवाब दिया जा सकता है।” उन्होंने शायराना अंदाज़ में कहा था, “है सियासत है परिंदा है शिकारी है, मगर इन सारी चीज़ों पर मोहब्बत अब भी भारी है।”
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बता दें कि इकरा जहाँ लोकसभा में हैं, वहीं इमरान राज्यसभा के सदस्य हैं। दोनों ही नेता ज़मीन से जुड़े हुए हैं और अपनी कम उम्र के बावजूद गहरी राजनीतिक समझ रखते हैं। उनकी जनसभाओं और रैलियों में लाखों की भीड़ उमड़ती है, जिसे सुनने और देखने के लिए हर जाति और धर्म के लोग आते हैं।
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ये दोनों नेता कभी लोगों को मंदिर मस्जिद के मुद्दे पर बाँटने या उस नाम पर राजनीति करने की कोशिश नहीं करते। यही वजह है कि लोग उनसे ज़्यादा जुड़ते हैं। शायद यही कारण है कि अखिलेश यादव हों या राहुल गांधी, दोनों को ही इन नेताओं पर अटूट भरोसा है और कई बार महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियाँ सौंपकर उन्होंने यह साबित भी कर दिया है कि आने वाले समय में ये दोनों अपनी राजनीतिक धाक जमाकर रहेंगे।
क्यों ओवैसी से अलग हैं इकरा और इमरान?
असदुद्दीन ओवैसी की उम्र लगभग 56 साल है और उनका राजनीतिक अनुभव भी लंबा है। वह राजनीति के सारे दाँव-पेंच जानते हैं मगर उनकी पहचान एक हैदराबाद के नेता के रूप में अधिक है, क्योंकि उनका राजनीतिक केंद्र वही रहा है। यही वजह है कि वह यूपी-बिहार के लोगों से उतना गहरा जुड़ाव महसूस नहीं करा पाते। वह ज़्यादातर समय हैदराबाद में गुज़ारते हैं। यूपी के ज़मीनी और छोटे-मोटे असल मुद्दे क्या हैं, शायद ओवैसी उन्हें उतनी गहराई से नहीं समझ पाते होंगे, जितना इकरा और इमरान समझते हैं। ओवैसी जब जनसभा के लिए आते हैं, तो वह मुद्दों से हटकर धर्म के नाम पर वोट पाने की कोशिश करते हैं।
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वहीं, महज़ 31 साल की इकरा, अपनी सादगी और सधे हुए अंदाज़ से लोगों को जोड़ती हैं। वह धर्म के बजाय असली मुद्दों और विकास की बात करती हैं। 38 साल के इमरान भी अपने शायराना अंदाज़ में मुद्दों को उठाते हैं। संसद हो या सड़क, दोनों ही जगह इन दोनों सांसदों ने अपनी क्षमता साबित की है। लोगों के बीच जाना और उनसे घुलमिल जाना ही वह बड़ी वजह है जो इन दोनों को ओवैसी से अलग करती है।
ये भीबता दें कि सांसद इकरा हसन (सपा) और इमरान (कांग्रेस) दोनों अलग-अलग दलों से आते हैं मगर 2024 का लोकसभा चुनाव दोनों दलों ने मिलकर लड़ा था। अगर विधानसभा चुनाव में भी यही गठबंधन बरकरार रहता है, तो यह ओवैसी की मुस्लिम वोटों को बाँटने की रणनीति को पूरी तरह से चकनाचूर कर सकता है। महागठबंधन में भी इन दोनों को मुस्लिम वोटों को एकजुट करने की विशेष ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।
मुस्लिम युवा नेता इकरा हसन भी संसद से लेकर सड़क तक काफी मुखर रहती हैं। यह जोड़ी साफ़ संकेत देती है कि आने वाले दिनों में यूपी की राजनीति में ये दोनों युवा नेता कमाल दिखाएंगे और इनकी वजह से मुस्लिम वोटों का बिखराव कम हो सकता है।


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