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ईरान के जाल में फंसे डोनाल्ड ट्रंप! सुपरपावर अमेरिका का घमंड हुआ चूर-चूर, हो गई किरकिरी!

दुश्मन को कमजोर समझने की भूल आखिरकार अमेरिका को काफी महंगी पड़ी है। बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप की गलत नीतियों के कारण दुनिया भर में अमेरिका की मिट्टी पलीद हो चुकी है। मैदान-ए-जंग में बुरी तरह पराजित होने के बावजूद ट्रंप खुद को विजेता दर्शाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। सच्चाई से मुंह फेर लेने से सच को झूठ में बदलना संभव नहीं है।

निकल गई ट्रंप की हेकड़ी

डोनाल्ड ट्रंप के तमाम सहयोगी और अमेरिकी नागरिक भी जानते हैं कि ईरान से उलझ कर कुछ हासिल नहीं हो सका। उलटा अमेरिका के सुपर पावर होने के दावे का गुब्बारा फूट चुका है। दुश्मन चाहे छोटा हो या बड़ा, उसे सिर्फ ताकत के दम पर कुचला नहीं जा सकता है। ताकत के साथ प्रभावी रणनीति, चतुराई और समय-समय पर सटीक कदम उठाने की जरूरत होती है। आधुनिक हथियारों और बड़ी फौज के दम पर यदि युद्ध के मैदान में जीत सुनिश्चित हो जाया करती तो आज यूक्रेन भी रूस के कदमों में पड़ा होता।

ईरान पर अमेरिका का कब्जा हो जाता। गाजा के संपूर्ण हिस्से पर इजरायल का ध्वज लहरा रहा होता। अफगानिस्तान में वहीं होता, जैसा अमेरिका या रूस चाहते। फिलहाल अमेरिका-ईरान समझौता चर्चाओं में है। समझौते पर अंतिम सहमति होना अभी बाकी है। वैसे सौ दिन से ज्यादा की जंग में ईरान का पलड़ा भारी नजर आया। डोनाल्ड ट्रंप सिर्फ बयानवीर की भूमिका में नजर आए। अमेरिका के चक्कर में कुछ देशों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा। वैसे मिडिल ईस्ट में शांति कायम रहना सबके हित में है।

समुद्री मार्ग पर ईरान का दबदबा

होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने से ईंधन की आपूर्ति सुचारू हो सकेगी। इस बीच अमेरिका और ईरान के अलग-अलग दावों से दुनिया में असमंजस की स्थिति है। डोनाल्ड ट्रंप का दावा है कि होर्मुज समुद्री मार्ग जल्द खुल जाएगा और ईरान को निकासी की एवज में जहाजों से टैक्स वसूलने का अधिकार नहीं होगा, मगर ईरान ने कहा है कि यह समुद्री मार्ग उसकी व्यवस्थाओं के तहत खुलेगा।

तेहरान ने यह भी रेखांकित किया है कि अंतिम वार्ता तब तक आरंभ नहीं होगी, जब तक उसकी फ्रीज संपत्तियों का कम से कम आधा हिस्सा जारी नहीं कर दिया जाता और उसके तेल पर लगे प्रतिबंध निलंबित नहीं कर दिए जाते। ऐसे में थोड़ी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, जब जेनेवा में इस समझौते पर हस्ताक्षर होंगे। इस समझौते पर हस्ताक्षर के बाद अगले दो माह तक ईरान के साथ उसके परमाणु कार्यक्रमों और अन्य विषयों पर वार्ता होगी।

साफ है कि यह भी देखना होगा कि इस वार्ता का परिणाम क्या रहता है? यदि ईरान इजरायल के लिए खतरा बने हिजबुल्ला, हमास और हूती जैसे संगठनों को उसके खिलाफ उकसाता रहता है तो पश्चिम एशिया कभी भी सुलग सकता है। वैसे होर्मुज समुद्री मार्ग के पहले की भांति खुलने एवं वहां से नौवहन में कोई बाधा न खड़ी होने से दुनिया की चिंता खत्म होगी और तमाम देशों की अर्थव्यवस्थाओं के समक्ष जो गंभीर संकट आया है, वह दूर हो पाएगा।

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उम्मीद की जानी चाहिए कि मिडिल ईस्ट की यह समस्या पूरी तरह से निपट जाएगी। खास बात यह है कि अमेरिका और इजरायल की चिंता अब पहले से ज्यादा बढ़ गई है। जिस ईरान को उन्होंने मिलकर सबक सिखाने की प्लानिंग की थी, वह फेल हो चुकी है। इजरायल को तो मालूम नहीं बल्कि भविष्य में अमेरिका जरूर ईरान से पंगा लेने से पहले सौ बार सोच-विचार करेगा।

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