UP Elections: ‘…तो मुसलमानों से उम्मीद मत रखना’, अखिलेश को किसने दी ये खुली चुनौती
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके मद्देनजर विभिन्न राजनीतिक दलों ने चुनावी रणनीति पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है। यूपी में फिलवक्त भाजपा का दबदबा है। भाजपा के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) को सबसे ताकतवर माना जाता है। बसपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (आप) और एआईएमआईएम जैसे दलों को भी अपना वोट बैंक है। सपा-बसपा को छोड़ दें तो बाकी दलों में भाजपा को टक्कर देने की ताकत नजर नहीं आती है। पिछले नौ साल से अधिक समय से सपा सत्ता से बाहर है। सत्ता में वापसी के लिए वह व्याकुल दिखाई पड़ती है।
पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी पार्टी के सबसे बड़े खेवनहार की भूमिका में हैं। निश्चित रूप से अगले विधानसभा चुनाव में सपा की ओर से खुद अखिलेश यादव मुख्यमंत्री पद का चेहरा होंगे, मगर इस बार किसी मुस्लिम चेहरे को इस पार्टी से सीएम पद का उम्मीदवार बनाने की मांग उठने लगी है। यह मांग सपा अध्यक्ष की मुसीबत बढ़ा सकती है।
सात प्रतिशत vs 22 प्रतिशत में फंसी सपा
दरअसल ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने सपा सुप्रीमो को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने कहा है कि अगले विस चुनाव में उन्हें किसी मुस्लिम नेता को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित करना चाहिए। पत्र में रजवी यह बताना नहीं भूले कि यूपी में यादव समुदाय की आबादी सात प्रतिशत और मुस्लिम समुदाय की आबादी 22 प्रतिशत है।
पत्र के मुताबिक मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव को सीएम बनाने में मुस्लिमों ने अहम भूमिका निभाई थी। रजवी का कहना है कि यदि अखिलेश यादव यह मांग नहीं मानते हैं तो उन्हें चुनाव में मुसलमानों से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। शहाबुद्दीन रजवी का यह पैंतरा सियासत में चर्चाओं में आ गया है। दरअसल पिछले कुछ साल में सपा के प्रति मुसलमानों की नाराजगी बढ़ी है। इसके कई कारण माने जा रहे हैं। सपा के फायर ब्रांड नेता आजम खान पर योगी सरकार में जिस प्रकार से शिकंजा कसा गया, वह जगजाहिर है, मगर आजम के बचाव में सपा ने प्रभावी तरीके से आवाज बुलंद करने की जहमत नहीं उठाई।
मुस्लिम समाज में सपा को लेकर पैदा हुई थी नाराजगी
आजम खान और उनका परिवार आज कानूनी झंझटों में फंसकर संघर्ष कर रहा है। इसके अलावा पुलिस कस्टडी में माफिया अतीक अहमद की हत्या के बाद सपा ने यूपी सरकार को घेरने का प्रयास तो किया, मगर उसके नतीजे उम्मीदों के अनुरूप न आने से भी मुस्लिम समाज में सपा को लेकर नाराजगी पैदा हुई थी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाता कभी किसी एक दल के पक्ष में नहीं रहे हैं। उन्होंने हमेशा उस दल को प्राथमिकता दी, जो भाजपा को मात देने की स्थिति में दिखा। मसलन कभी कांग्रेस, कभी सपा तो कभी बसपा को मुस्लिमों का समर्थन मिलता रहा।
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वर्तमान में भाजपा ने इस राज्य में खुद को काफी मजबूत कर लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कड़क व ईमानदार छवि एवं कार्यशैली का जादू आम मतदाता के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। माना जाता है कि अगले साल होने वाले विस चुनाव में भाजपा एक बार फिर योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में मैदान में उतरेगी। इसके इतर यदि सपा से मुस्लिम नेता को सीएम पद का प्रत्याशी बनाने की मांग जोर पकड़ती है तो अखिलेश यादव पर दबाव बढ़ना तय है। इस मुद्दे पर यदि वह चुप्पी साधे रखते हैं तो उन्हें चुनाव में नुकसान भी हो सकता है।

