UP की 403 सीटों का वो खौफनाक गणित, जिसने सपा-कांग्रेस गठबंधन को टूटने की कगार पर ला खड़ा किया
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होते ही सूबे की सियासत में जबरदस्त हलचल मच गई है। भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बेदखल करने के मकसद से साथ आए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन में अब दरारें साफ नजर आने लगी हैं।
विवाद की मुख्य जड़ सीटों का बंटवारा है, जिसने गठबंधन की एकता पर सवालिया निशान लगा दिया है। दिलचस्प बात यह है कि दोनों खेमों के शीर्ष नेतृत्व यानी अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने इस पूरे घटनाक्रम पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन पार्टी के प्रमुख नेता और प्रवक्ता एक-दूसरे पर जमकर सियासी तीर चला रहे हैं। सपा नेतृत्व की तल्खी उस वक्त खुलकर सामने आ गई जब इंडिया ब्लॉक की अहम बैठक में सपा मुखिया अखिलेश यादव खुद शामिल नहीं हुए और अपनी जगह प्रतिनिधि को भेजकर कांग्रेस को कड़ा संदेश दिया।
कांग्रेस की 150 सीटों की मांग से असहज हुई समाजवादी पार्टी
नई दिल्ली के गलियारों से लेकर लखनऊ के सियासी अखाड़े तक चुनावी बिसात बिछाई जा रही है। इसी बीच कांग्रेस ने गठबंधन में अपनी मजबूत स्थिति दर्ज कराने के इरादे से 150 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की दावेदारी ठोक दी है। कांग्रेस की इस भारी-भरकम मांग ने सपा आलाकमान को पशोपेश में डाल दिया है। सपा को यह शर्त कतई रास नहीं आ रही है। हालांकि साइकिल पार्टी ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि वह कांग्रेस को असल में कितनी सीटें देना चाहती है, लेकिन बयानों के जरिए कांग्रेस को जमीनी हकीकत का अहसास कराना शुरू कर दिया गया है।
सपा सांसद के बयान पर भड़की कांग्रेस, अकेले लड़ने की दी चेतावनी
तनातनी तब और तेज हो गई जब सपा के राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन ने कांग्रेस को सलाह दी कि उसे सिर्फ उन्हीं चुनिंदा सीटों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहां उसका वास्तविक जनाधार मजबूत है। सपा सांसद की यह नसीहत कांग्रेस को नागवार गुजरी, क्योंकि यूपी में सपा और बसपा के उभार के बाद से कांग्रेस लगातार हाशिए पर रही है। सांसद के इस बयान पर तीखा पलटवार करते हुए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि अगर सम्मानजनक समझौता नहीं हुआ तो पार्टी अकेले अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरने से पीछे नहीं हटेगी।
403 सीटों का चुनावी गणित और सपा की असली दुविधा
उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों का समीकरण सपा के लिए खासा पेंचीदा बना हुआ है। यदि सपा 150 सीटें कांग्रेस को सौंप देती है, तो उसके अपने खाते में महज 247 सीटें ही बचेंगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन 247 सीटों पर चुनाव लड़कर सपा अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा छू पाएगी या नहीं, यह बड़ा संशय है। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी अधिक से अधिक सीटों पर खुद प्रत्याशी उतारना चाहती है ताकि सरकार बनने की स्थिति में कोई भी सहयोगी दल उस पर दबाव न बना सके।
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मायावती की सक्रियता और योगी आदित्यनाथ का मजबूत फैक्टर
इस सियासी खींचतान के बीच बहुजन समाज पार्टी की सक्रियता ने भाजपा, सपा और कांग्रेस तीनों दलों की बेचैनी बढ़ा दी है। बसपा सुप्रीमो मायावती की दलित वोट बैंक पर मजबूत पकड़ मानी जाती रही है, हालांकि हालिया चुनावों में दलित मतदाताओं का बड़ा झुकाव भाजपा की तरफ देखा गया है। आने वाले चुनाव में दलित और मुस्लिम मतदाता किस करवट बैठेंगे, यह अभी तय होना बाकी है। वहीं दूसरी ओर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूरे प्रदेश में विकास और कानून-व्यवस्था के दम पर एक स्वच्छ व कद्दावर नेता की छवि बनाई है। उन्हें किसी एक जाति के दायरे में समेट कर नहीं देखा जाता और वर्तमान में भी वे सीएम पद के लिए मतदाताओं की पहली पसंद बने हुए हैं। ऐसे कड़े सियासी समीकरणों के बीच सपा-कांग्रेस की यह खींचतान कहां जाकर थमती है, इस पर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं।

