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सपा को सीधा चैलेंज! राहुल गांधी ने खींचा नया चक्रव्यूह, क्या टूट जाएगा यूपी का सबसे चर्चित गठबंधन?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। भारतीय जनता पार्टी के चुनावी चक्रव्यूह को भेदने के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का ‘दो लड़कों’ वाला गठबंधन मंचों पर एकजुट नजर आ रहा है, लेकिन अंदरखाने खींचतान लगातार गहरी होती दिख रही है। गठबंधन में सीट शेयरिंग को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच सहमति बनना आसान नहीं लग रहा है। इसी बीच कांग्रेस नेतृत्व ने एक ऐसा सियासी दांव चला है जिसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है।

गैर-यादव ओबीसी चेहरों से राहुल की मुलाकात के मायने

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी से हाल ही में उत्तर प्रदेश के कई असरदार गैर-यादव ओबीसी नेताओं ने मुलाकात की है। इनमें पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय चौहान और अपना दल (कमेरावादी) के पंकज निरंजन जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। राजनीतिक विश्लेषक इसे सामान्य शिष्टाचार भेंट नहीं मान रहे हैं।

ये वही नेता हैं जिनका पूर्वांचल और अवध के जिलों में मौर्य, कोइरी, शाक्य, चौहान और कुर्मी बिरादरी के बीच ठोस जनाधार माना जाता है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में ये सभी दल अखिलेश यादव के गठबंधन का अहम हिस्सा थे, लेकिन बाद में दूरियां बढ़ गईं। अब इन चेहरों का राहुल गांधी के करीब आना समाजवादी पार्टी की पेशानी पर बल डालने के लिए काफी है।

सीट शेयरिंग पर सपा पर दबाव बनाने की रणनीति

इस मुलाकात के पीछे कांग्रेस की सोची-समझी रणनीति काम कर रही है। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव कांग्रेस को केवल उसकी मजबूत और सीमित सीटों तक समेटने के पक्ष में हैं, जबकि कांग्रेस इस बार यूपी में अपनी हिस्सेदारी घटाने के मूड में बिल्कुल नहीं है। पार्टी आंतरिक तौर पर करीब 150 सीटों पर होमवर्क कर रही है और उसका लक्ष्य 110 से 120 सीटों पर दावेदारी पेश करने का है। इन क्षेत्रीय क्षत्रपों को साथ लाकर कांग्रेस सपा को सीधा संदेश दे रही है कि उसके पास केवल पारंपरिक वोट बैंक ही नहीं, बल्कि पिछड़े वर्गों का एक स्वतंत्र सामाजिक समीकरण भी खड़ा करने की क्षमता है, जिससे टेबल पर उसकी बारगेनिंग पावर काफी बढ़ जाएगी।

क्या तैयार हो रहा है कांग्रेस का ‘प्लान बी’?

सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की भी है कि यदि अखिलेश यादव कांग्रेस की शर्तों पर सीटें देने को तैयार नहीं हुए, तो क्या कांग्रेस अकेले मैदान में उतरने का जोखिम उठाएगी? इसी बिंदु पर कांग्रेस का ‘प्लान बी’ सक्रिय होता दिखता है। यदि गठबंधन टूटता है, तो केवल मुस्लिम और दलित वोटों के सहारे यूपी की चुनावी वैतरणी पार नहीं की जा सकती। ऐसे में कांग्रेस को मजबूत गैर-यादव ओबीसी आधार की जरूरत होगी। स्वामी प्रसाद मौर्य, संजय चौहान और कुर्मी-पटेल वर्ग के नेताओं को अपने पाले में लाकर पार्टी उसी संभावित परिदृश्य की जमीन तैयार कर रही है, ताकि अकेले लड़ने की नौबत आने पर भी वह मजबूती से ताल ठोक सके।

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2027 की लड़ाई और यूपी का नया सामाजिक समीकरण

कांग्रेस की नजर सिर्फ सीटों के आंकड़े पर नहीं, बल्कि यूपी में अपने खोए हुए आधार को दोबारा जिंदा करने पर है। पार्टी पारंपरिक ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित समीकरण के साथ-साथ अब गैर-यादव ओबीसी बिरादरियों को जोड़कर एक नया सोशल इंजीनियरिंग मॉडल तैयार करने में जुटी है। फिलहाल सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि क्या अखिलेश और राहुल का यह गठबंधन सीटों के फॉर्मूले पर टिक पाएगा, या फिर सीट बंटवारे की यह रस्साकशी 2027 के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में एक नए सियासी ध्रुवीकरण की इबारत लिख देगी।

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