प्रतिबंध हटे: 47 साल बाद अमेरिका खरीदेगा ईरान का तेल, तेहरान के तेवरों के आगे झुके ट्रंप
Iran US talks 2026: वैश्विक कूटनीति के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। स्विट्जरलैंड में चल रही त्रिपक्षीय वार्ता के दौरान ईरान के तीखे और आक्रामक तेवरों के सामने आखिरकार महाशक्ति अमेरिका को झुकना ही पड़ा। ईरान ने बातचीत की मेज पर आने से पहले और बातचीत के दौरान अपना वही चिरपरिचित सख्त रुख बनाए रखा, जिसके लिए वह दुनिया भर में जाना जाता है।
हालात इस कदर तनावपूर्ण थे कि बैठक की शुरुआत में ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने अमेरिकी अधिकारियों से हाथ मिलाना तो दूर, उनकी तरफ देखना तक गंवारा नहीं किया। इतना ही नहीं, वार्ता के बीच में अपनी गहरी नाराजगी जताते हुए ईरानी राजनयिकों ने वॉकआउट तक कर दिया। लेकिन इस भारी दबाव के बावजूद, परदे के पीछे चली कूटनीति रंग लाई और अमेरिका को ईरान पर लगे सख्त तेल प्रतिबंधों में बड़ी ढील देने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
अमेरिकी वित्त विभाग का बड़ा फैसला और 60 दिनों का अस्थाई लाइसेंस
इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के तहत अमेरिकी वित्त विभाग (US Department of the Treasury) ने एक सामान्य लाइसेंस जारी कर दिया है। इसके तहत 21 अगस्त तक ईरानी मूल के कच्चे तेल, पेट्रोकेमिकल और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री को पूरी तरह वैध कर दिया गया है। इस आधिकारिक लाइसेंस में साफ तौर पर उल्लेख किया गया है कि यदि तेल की बिक्री, वितरण या अनलोडिंग के लिए जरूरी हुआ, तो ईरानी तेल को सीधे अमेरिका में भी आयात किया जा सकेगा। आपको बता दें कि साल 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से अमेरिका ने ईरान से कच्चे तेल की एक बूंद भी आयात नहीं की थी, ऐसे में यह फैसला दोनों देशों के रिश्तों में एक बहुत बड़ा यू-टर्न माना जा रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और परमाणु निरीक्षकों पर बनी सहमति
अमेरिकी वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट ने स्विट्जरलैंड में चल रही इस सार्थक वार्ता की सफलता की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि इस बड़ी ढील के बदले में ईरान ने भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत देने वाले वादे किए हैं। ईरान अब होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में अंतरराष्ट्रीय जहाजों के स्वतंत्र और खुले पारगमन (Free Transit) को सुनिश्चित करेगा। इसके साथ ही, तेहरान ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षकों को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की जांच के लिए देश में आने की अनुमति देने की बेहद महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता भी जताई है।
अमेरिकी डॉलर में होगा भुगतान लेकिन इन देशों को छूट नहीं
वाशिंगटन और तेहरान के बीच पिछले सप्ताह हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (MoU) के आधार पर जारी यह सामान्य लाइसेंस 60 दिनों के लिए वैध रहेगा। इसके तहत अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने ईरानी कच्चे तेल, पेट्रोलियम उत्पादों और उससे जुड़ी सेवाओं के लिए पूर्ण छूट की अनुमति दी है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस व्यापार के लिए ईरान को अमेरिकी डॉलर में भुगतान किया जा सकेगा। हालांकि, वाशिंगटन ने अपनी कूटनीतिक घेराबंदी को कायम रखते हुए स्पष्ट किया है कि क्यूबा, उत्तर कोरिया और क्रीमिया जैसे देशों को इस अमेरिकी प्रतिबंध छूट के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है।
1979 के दूतावास संकट से चीनी रिफाइनरियों के सिंडिकेट तक का सफर
गौरतलब है कि अमेरिका ने ईरान पर पहली बार प्रतिबंध साल 1979 में लगाए थे, जब ईरान के क्रांतिकारी छात्रों ने तेहरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर वहां के राजनयिकों को बंधक बना लिया था। इसके बाद ईरान के विवादास्पद परमाणु कार्यक्रम और चरमपंथी संगठनों को वित्तीय मदद देने के आरोपों के चलते अमेरिका ने समय-समय पर कई कड़े प्रतिबंध थोपे। इन प्रतिबंधों के बावजूद, ईरान के तेल को पूरी तरह ठप नहीं किया जा सका था, क्योंकि चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियों ने भारी छूट (Discounts) पर ईरानी तेल की लगातार खरीदारी जारी रखी। वहीं साल 2018 में जब तत्कालीन अमेरिकी सरकार ने प्रतिबंध दोबारा कड़े किए थे, उससे पहले भारत, दक्षिण कोरिया, जापान, इटली, ग्रीस, ताइवान और तुर्की भी ईरानी तेल के सबसे बड़े खरीदारों में शुमार थे।
युद्धविराम की अवधि बढ़ी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में औंधे मुंह गिरे तेल के दाम
स्विट्जरलैंड में मौजूद मध्यस्थों का कहना है कि अंतिम स्थायी शांति समझौते के लिए शुरू हुई इस वार्ता के पहले दौर में दोनों पक्षों ने बेहद उत्साहजनक प्रगति दर्ज की है। यह पूरी बातचीत पिछले हफ्ते हुए समझौते पर टिकी है, जिसके तहत अप्रैल महीने से लागू अनिश्चितकालीन युद्धविराम को कम से कम अगले 60 दिनों के लिए बढ़ा दिया गया है।
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इससे पहले, जब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी करने की धमकी दी थी, तब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया था, जिसके जवाब में अमेरिका ने भी ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी कर दी थी। लेकिन इस ताजा अंतरिम समझौते की खबर बाहर आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें क्रैश हो गईं और यह 28 फरवरी को हुए अमेरिका-इजरायल हमलों से ठीक पहले के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई हैं, जो वैश्विक उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत है।

