यूपी की इस वीआईपी सीट पर आज भी नहीं चला ‘मोदी-योगी मैजिक’, अखिलेश के लिए बना है सबसे बड़ा ‘अभिमान’
उत्तर प्रदेश की राजनीति में वैसे तो किसी भी दल की आंधी या लहर का बड़ा असर देखने को मिलता है, लेकिन सुल्तानपुर जिले की इसौली विधानसभा सीट ने हमेशा से चुनावी पंडितों के सभी समीकरणों को धंधा कर दिया है।
केंद्र से लेकर राज्य तक भले ही बीजेपी की लहर ने बड़े-बड़े सियासी किलों को जमींदोज कर दिया हो, लेकिन इसौली एक ऐसा दुर्ग बन चुका है जहां भगवा दल आज भी अपनी जमीन और जीत की तलाश में जुटा हुआ है।
साल 2002 से लेकर 2022 तक हुए पिछले पांचों विधानसभा चुनावों में यहां की जनता ने सिर्फ समाजवादी पार्टी के साइकिल चुनाव चिह्न पर ही अपना भरपूर भरोसा जताया है। मुलायम सिंह यादव के दौर से शुरू हुआ यह सफर अखिलेश यादव के कार्यकाल में भी पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़ रहा है, जिसके चलते यह सीट अब सपा के लिए सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं बल्कि उसका सियासी अभिमान बन चुकी है जिसे भेद पाना विरोधियों के लिए लोहे के चने चबाने जैसा साबित हो रहा है।
मोदी लहर में भी नहीं डिगा सुल्तानपुर का यह किला, सिर्फ 269 वोटों से चूकी थी बीजेपी
साल 2017 की देशव्यापी प्रचंड मोदी लहर हो या फिर साल 2022 का हाई-वोल्टेज चुनाव, बीजेपी ने इस सीट पर कमल खिलाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन हर बार पार्टी को निराशा ही हाथ लगी।
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में तो मुकाबला इतना ज्यादा रोमांचक और कांटे का हो गया था कि बीजेपी प्रत्याशी ओम प्रकाश पांडे बजरंगी महज 269 वोटों के बेहद मामूली अंतर से चुनाव हार गए थे।
समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद ताहिर खान ने बेहद कम अंतर से जीत दर्ज कर इस सीट पर पार्टी का परचम एक बार फिर फहरा दिया था, जिससे यह साफ हो गया कि इसौली में जीत का अंतर भले ही कितना भी सूक्ष्म क्यों न हो, लेकिन यहां की जनता का झुकाव सपा के इस मजबूत किले की तरफ अटूट बना हुआ है। इस बेहद करीबी हार के बाद से ही बीजेपी ने इस सीट को अपने ‘रेड जोन’ में शामिल कर लिया है और आने वाले 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए अभी से जमीनी स्तर पर चक्रव्यूह रचना शुरू कर दी है।
इसौली विधानसभा का जातीय समीकरण और एमवाई फैक्टर की असली ताकत
इस सीट पर समाजवादी पार्टी की सफलता के पीछे मुख्य वजह उसका बेहद मजबूत ‘एमवाई’ यानी मुस्लिम-यादव समीकरण और स्थानीय ताना-बाना है। इसौली विधानसभा क्षेत्र में लगभग 80,000 मुस्लिम मतदाता और 40,000 से अधिक यादव वोटर मौजूद हैं, जो पारंपरिक रूप से सपा का सबसे बड़ा और मजबूत वोट बैंक माने जाते हैं।
इसके साथ ही इस क्षेत्र में ब्राह्मण, गैर-यादव ओबीसी और क्षत्रिय जातियों का भी बड़ा प्रभाव देखने को मिलता है, जहां चंद्र सिंह सोनू और यशभद्र सिंह मोनू जैसे स्थानीय क्षत्रिय नेताओं का व्यक्तिगत प्रभाव जातिगत सीमाओं से ऊपर उठकर चुनावी नतीजों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। यही कारण है कि बीजेपी अब पारंपरिक एमवाई समीकरण के इतर गैर-यादव पिछड़ी जातियों, दलितों और स्वर्ण मतदाताओं को एकजुट करने के लिए बूथ स्तर पर माइक्रो मैनेजमेंट कर रही है ताकि 2027 के रण में इस अचूक किले को नेस्तनाबूद किया जा सके।
2027 के रण में बीजेपी की माइक्रो प्लानिंग और सपा के सामने खड़ी बड़ी चुनौतियां
आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने इसौली में जीत हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है और वह दलित मतों के विभाजन के साथ-साथ सवर्ण व अति पिछड़ा वोट बैंक को अपने पाले में लाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है।
दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी के सामने भी इस ऐतिहासिक किले को बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है क्योंकि लगातार पांच बार से लगातार सत्ता में न रहने और इस सीट पर लंबे समय तक कब्जा होने के कारण स्थानीय स्तर पर एंटी-इन्कंबेंसी यानी सत्ता विरोधी रुझान और टिकट के कई दावेदारों के बीच संतुलन साधना पार्टी नेतृत्व के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
योगी, अखिलेश या मायावती; जानें किसने बदले सबसे ज्यादा नाम
कुल मिलाकर, मुलायम सिंह के दौर से खड़ा हुआ यह पुराना समाजवादी किला अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी अपनी पूरी शान के साथ खड़ा है, लेकिन आगामी 2027 के चुनाव यह तय करेंगे कि क्या सीएम योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली बीजेपी टीम इस अचूक किले में अपना भगवा परचम लहराने में कामयाब हो पाती है या फिर साइकिल का यह सफर यूं ही अबाध गति से दौड़ता रहेगा।

