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IIT बॉम्बे में कोहराम, 1 साल में 4 आत्महत्याएं; आखिर किस दबाव में जान दे रहे हैं होनहार

जीवन के कठिन डगर पर जब हौसले पस्त होते हैं, तो मंजिल की दहलीज पर पहुंचकर भी इंसान टूट जाता है। देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) में दाखिला पाकर अपने सपनों को नई उड़ान देने वाले होनहार छात्र साहिल वाकोडे का सफर असमय और बेहद दर्दनाक मोड़ पर खत्म हो गया।

साहिल के सुसाइड ने न सिर्फ पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी साख रखने वाले इस शीर्ष तकनीकी संस्थान की आंतरिक व्यवस्थाओं और संवेदनशीलता को भी सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। इंजीनियरिंग के लाखों छात्रों के लिए प्रेरणा माने जाने वाले संस्थान के हॉस्टल से आई इस मौत की खबर ने उच्च शिक्षा में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और प्रशासनिक दबाव पर नई बहस छेड़ दी है।

एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज, डीन को पद से हटाकर छुट्टी पर भेजा गया

साहिल वाकोडे खुदकुशी प्रकरण ने अब गंभीर कानूनी और प्रशासनिक मोड़ ले लिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की सख्त धाराओं के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर जांच तेज कर दी है। बढ़ते विवाद और दबाव के बीच संस्थान के डीन (प्रशासनिक मामले) को उनके पद से तत्काल प्रभाव से हटाते हुए लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया है। वहीं पीड़ित परिवार इंसाफ की गुहार लगा रहा है। साहिल के पिता ने प्रशासनिक रवैये पर कड़ा रोष जताते हुए चेतावनी दी है कि यदि उनके बेटे को समयबद्ध और निष्पक्ष न्याय नहीं मिला, तो वे आमरण अनशन और भूख हड़ताल पर बैठने को विवश होंगे।

दो खेमों में बंटी राय: एक तबका मांग रहा न्याय, तो दूसरे ने उठाई निष्पक्ष जांच की मांग

इस संवेदनशील घटनाक्रम के बाद कैंपस और समाज दो अलग-अलग विचारों में बंटा नजर आ रहा है। एक वर्ग जहां छात्र के साथ हुए कथित भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ खुलकर सामने आया है और आरोपियों की गिरफ्तारी व कड़ी सजा की मांग कर रहा है, वहीं दूसरा वर्ग मामले की समग्र और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर बल दे रहा है। इतना ही नहीं, संस्थान के भीतर से डीन के समर्थन में भी कुछ आवाजें उठी हैं, जिनका तर्क है कि नियमों का पालन कराने वाले शिक्षकों पर एकतरफा कार्रवाई से प्रशासनिक संतुलन बिगड़ सकता है। पुलिस अब तमाम इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों, बयानों और परिस्थितियों की कड़ियां जोड़कर वास्तविक कारणों की तह तक पहुंचने में जुटी है।

1 साल में 4 आत्महत्याएं: क्या चरमरा गई है संस्थानों की आंतरिक व्यवस्था?

आईआईटी बॉम्बे से सामने आया यह मामला कोई अकेला या पहला वाकया नहीं है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले महज एक वर्ष के भीतर इसी संस्थान में आत्महत्या के चार मामले सामने आ चुके हैं। कोटा के कोचिंग सेंटरों से लेकर देश के नामी उच्च शिक्षण संस्थानों तक लगातार सामने आ रही छात्रों की मौतें यह साबित करती हैं कि समस्या बेहद गहरी है। किसी भी महान संस्थान की नींव सिर्फ उसकी भव्य इमारतों या विशाल बजट पर नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शी आंतरिक व्यवस्था, निष्पक्षता और छात्रों के भरोसे पर टिकी होती है। यदि संस्थानों की आंतरिक शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal Mechanism) पारदर्शी और समयबद्ध नहीं होगी, तो विवादों का सड़क और थानों तक पहुंचना लाजिमी है।

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डिग्री की गुणवत्ता और मानसिक संबल: काउंसलिंग तंत्र को मजबूत करने की दरकार

इस पूरे प्रकरण ने उच्च शिक्षा की कार्यप्रणाली के समक्ष दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। यदि शिक्षक या मूल्यांकनकर्ता हर समय व्यक्तिगत कानूनी मुकदमों के खौफ में रहेंगे, तो वे नियमों के सख्त अनुपालन से बच सकते हैं, जिसका सीधा नुकसान अकादमिक मानकों और मेरिट पर आगे बढ़ने वाले छात्रों को होगा। वहीं दूसरी ओर, प्रारंभिक परीक्षाओं, कठिन ग्रेडिंग सिस्टम और परिवेशगत बदलावों के कारण भारी तनाव में घिरने वाले छात्रों को अकेला छोड़ देना भी आपराधिक लापरवाही है। जानकारों का मानना है कि आईआईटी प्रशासन को आलोचनाओं से बचने के बजाय अपने सपोर्ट सिस्टम, प्रोफेशनल साइकोलॉजिकल काउंसलिंग और मेंटरशिप मॉडल को बुनियादी स्तर पर मजबूत करना होगा, ताकि किसी और छात्र की जिंदगी असमय न थमे।

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